जबलपुर में डीजे पर प्रतिबंध से गरीब कलाकारों के घरों में जलेगी खुशियों की रोशनी! ढोल-धमाल और बैंड-बाजे की लौटेगी रौनक, नियम तोड़ने वालों पर पुलिस का सख्त एक्शन

जबलपुर। शहर में डीजे पर प्रतिबंध के बाद अब ढोल-धमाल, बैंड-बाजा और रोशनी के पारंपरिक कारोबार से जुड़े गरीब परिवारों को रोजगार की नई उम्मीद दिखाई देने लगी है। जिन मजदूरों के हाथों में लाइटें होती हैं, जो सिर पर रोशनी के गमले रखकर धार्मिक आयोजनों और चल समारोहों में अपनी सेवाएं देते हैं, उनके लिए अब काम के अवसर बढ़ने की संभावना है। डीजे के बढ़ते चलन के बीच कहीं न कहीं पारंपरिक कलाकारों और मजदूरों की रोजी-रोटी प्रभावित हुई है। ऐसे में प्रशासन की सख्ती के बाद एक बार फिर पारंपरिक वाद्य यंत्रों और बैंड-बाजे की गूंज सुनाई देने की उम्मीद है।
डीजे पर लगाम, पारंपरिक कलाकारों को मिल सकता है रोजगार,
जबलपुर में धार्मिक आयोजनों, प्रतिमा विसर्जन जुलूसों और चल समारोहों के दौरान डीजे के इस्तेमाल को लेकर प्रशासन ने सख्त रुख अपनाया है। अब आयोजनों में ढोल-धमाल, नगाड़े, बैंड-बाजा और पारंपरिक रोशनी की व्यवस्था को भी महत्व मिल सकता है। इससे उन परिवारों को फायदा होने की उम्मीद है, जिनकी आजीविका इन्हीं कामों पर निर्भर है। सवाल यह है कि क्या डीजे पर नियंत्रण के साथ उन गरीब मजदूरों के घरों में भी खुशियों की रोशनी पहुंचेगी, जो लंबे समय से अपने पारंपरिक रोजगार को बचाने की कोशिश कर रहे हैं?
जिला कलेक्टर और एसपी का स्पष्ट संदेश, नियम तोड़े तो होगी कार्रवाई,
जबलपुर के जिला कलेक्टर अरुण कुमार विश्वकर्मा और पुलिस अधीक्षक सम्पत उपाध्याय ने डीजे संचालकों और आयोजन समितियों को नियमों का पालन करने का स्पष्ट संदेश दिया है। प्रशासन की ओर से निर्धारित सीमा और अनुमति के अनुसार ही साउंड सिस्टम चलाने के निर्देश दिए गए हैं। बताया गया है कि चार बॉक्स की अनुमति के अलावा नियमों का उल्लंघन करने पर सख्त कार्रवाई की जा सकती है। आयोजकों को भी यह सुनिश्चित करना होगा कि चल समारोह और जुलूस के दौरान प्रतिबंधित डीजे का इस्तेमाल न हो।
समितियों की जिम्मेदारी भी तय, उल्लंघन पर कार्रवाई संभव,
प्रशासन का रुख स्पष्ट है कि धार्मिक आस्था और उत्सव की आड़ में नियमों की अनदेखी बर्दाश्त नहीं की जाएगी। यदि किसी चल समारोह में प्रतिबंधित डीजे का उपयोग पाया जाता है या निर्धारित अनुमति की शर्तों का उल्लंघन होता है, तो संबंधित लोगों के खिलाफ नियमानुसार कार्रवाई की जा सकती है। आयोजन समितियों और डीजे संचालकों को कार्यक्रम से पहले अनुमति की शर्तें समझनी होंगी। नियमों का पालन करना केवल प्रशासन की नहीं, बल्कि प्रत्येक आयोजक की भी जिम्मेदारी है।
डीजे की तेज आवाज पर नियंत्रण, गरीबों के रोजगार की उम्मीद,
इस पूरे मामले का एक दूसरा पहलू भी है। ढोल बजाने वाले कलाकार, बैंड-बाजा संचालक, लाइट उठाने वाले मजदूर और छोटे व्यवसायी अपने हुनर के दम पर परिवार चलाते हैं। जब आयोजनों में केवल डीजे को प्राथमिकता मिलती है, तो पारंपरिक कलाकारों के काम पर असर पड़ सकता है। ऐसे में डीजे पर नियंत्रण से उन्हें काम मिलने की संभावना बढ़ सकती है। हालांकि, वास्तविक लाभ तभी होगा जब आयोजन समितियां भी स्थानीय कलाकारों और मजदूरों को अवसर देंगी।
आस्था के साथ नियमों का पालन भी जरूरी,
जबलपुर में प्रशासन की इस पहल का उद्देश्य नियमों के अनुसार आयोजन सुनिश्चित करना और निर्धारित प्रतिबंधों का पालन कराना है। यदि इसके साथ पारंपरिक कलाकारों को भी प्रोत्साहन मिलता है, तो शहर में ढोल-धमाल और बैंड-बाजे की पुरानी रौनक लौट सकती है। इससे एक ओर धार्मिक आयोजनों की परंपरा मजबूत होगी, वहीं दूसरी ओर मेहनतकश परिवारों को रोजगार का सहारा मिल सकता है।