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कौन हैं श्रीलंका को भुखमरी के दलदल में फंसाने वाले 5 विलेन, इन 5 वजहों से महंगाई ने तोड़े सारे रिकॉर्ड

श्रीलंका 1948 में अपनी आजादी के बाद से सबसे बुरे आर्थिक संकट से गुजर रहा है। श्रीलंका सरकार के मंत्री सामूहिक इस्तीफा दे चुके हैं। श्रीलंका में लोगों को रोजमर्रा से जुड़ी चीजें भी नहीं मिल पा रही हैं या कई गुना महंगी मिल रही हैं। श्रीलंका का विदेशी मुद्रा भंडार लगभग खत्म हो चुका है, जिससे वह जरूरी चीजों का आयात नहीं कर पा रहा है।

देश में अनाज, चीनी, मिल्क पाउडर, सब्जियों से लेकर दवाओं तक की कमी है। पेट्रोल पंपों पर सेना तैनात करनी पड़ी है। देश में 13-13 घंटे की बिजली कटौती हो रही है। देश का सार्वजनिक परिवहन ठप हो गया है, क्योंकि बसों को चलाने के लिए डीजल ही नहीं है।

चलिए समझते हैं कि आखिर किन कारणों से इतने गहरे आर्थिक संकट में फंसा श्रीलंका? भारत कैसे कर रहा है श्रीलंका की मदद? 

श्रीलंका में मंत्रिमंडल ने दिया सामूहिक इस्तीफा
श्रीलंका में आर्थिक संकट की वजह से लोगों की नाराजगी को देखते हुए सरकार के सभी 26 मंत्रियों ने इस्तीफा दे दिया। केवल राष्ट्रपति गोटबाया राजपक्षे और प्रधानमंत्री महिंदा राजपक्षे ने इस्तीफा नहीं दिया है। गोटबाया ने जल्द बनने वाली सर्वदलीय सरकार में विपक्षी नेताओं को भी शामिल होने का न्योता दिया है। इससे पहले अपने घर के बाहर हो रहे विरोध प्रदर्शन को देखते हुए गोटबाया ने देश में आपातकाल लागू कर दिया था, जिसे अब हटा दिया गया है।

श्रीलंका में 1900 रुपए में बिक रहा एक किलो मिल्क पाउडर
श्रीलंका में महंगाई इस कदर ऊपर पहुंच गई है कि वहां चावल 220 रुपए प्रति किलो और गेहूं 190 रुपए प्रति किलो की दर से बिक रहा है। वहीं, एक किलोग्राम चीनी की कीमत 240 रुपए, नारियल तेल 850 रुपए प्रति लीटर, जबकि एक अंडा 30 रुपए और 1 किलो मिल्क पाउडर की रिटेल कीमत 1900 रुपए तक पहुंच गई है। पिछले हफ्ते 12.5 किलो गैस सिलेंडर की कीमत 4200 रुपए हो गई थी।

चलिए डालते हैं उन 5 बड़े कारणों पर नजर, जिन्होंने डुबोई श्रीलंका की लुटिया।

1. कर्ज ने बिगाड़ा लंका का खेल

पिछले एक दशक के दौरान श्रीलंका की सरकारों ने जमकर कर्ज लिए, लेकिन इसका सही तरीके से इस्तेमाल करने के बजाय दुरुपयोग ही किया।

  • 2010 के बाद से ही लगातार श्रीलंका का विदेशी कर्ज बढ़ता गया। श्रीलंका ने अपने ज्यादातर कर्ज चीन, जापान और भारत जैसे देशों से लिए हैं।
  • 2018 से 2019 तक श्रीलंका के प्रधानमंत्री रहे रानिल विक्रमसिंघे ने हंबनटोटा पोर्ट को चीन को 99 साल की लीज पर दे दिया था। ऐसा चीन के लोन के पेमेंट के बदले किया गया था। ऐसी नीतियों ने उसके पतन की शुरुआत की।
  • इसके अलावा उस पर वर्ल्ड बैंक, एशियन डेवलेपमेंट बैंक जैसे ऑर्गेनाइजेशन का भी पैसा बकाया है। साथ ही उसने इंटरनेशनल मार्केट से भी उधार लिया है।
  • 2019 में एशियन डेवलेपमेंट बैंक ने श्रीलंका को एक ‘जुड़वा घाटे वाली अर्थव्यवस्था’ कहा था। जुड़वा घाटे का मतलब है कि राष्ट्रीय खर्च राष्ट्रीय आमदनी से अधिक होना।
  • श्रीलंका की एक्सपोर्ट से अनुमानित आय 12 अरब डॉलर है, जबकि इम्पोर्ट से उसका खर्च करीब 22 अरब डॉलर है, यानी उसका व्यापार घाटा 10 अरब डॉलर का रहा है।
  • श्रीलंका जरूरत की लगभग सभी चीजें, जैसे-दवाएं, खाने के सामान और फ्यूल के लिए बुरी तरह इम्पोर्ट पर निर्भर है। ऐसे में विदेशी मुद्रा की कमी की वजह से वह ये जरूरी चीजें नहीं खरीद पा रहा है।
  • पिछले 2 वर्षों में श्रीलंका का विदेशी मुद्रा भंडार 70% तक घट गया है। फरवरी तक श्रीलंका के विदेशी मुद्रा भंडार में केवल 2.31 बिलियन डॉलर ही बचा था, जबकि 2022 में ही उसे लगभग 4 बिलियन डॉलर का लोन चुकाना है।
  • श्रीलंका में महंगाई दर 17% को पार कर गई है। वहां एक डॉलर की कीमत करीब 298 श्रीलंकाई रुपए तक पहुंच गई है और एक भारतीय रुपए की कीमत 3.92 श्रीलंकाई रुपए हो गई है।

2. राजपक्षे का टैक्स में कटौती का फैसला पड़ा उल्टा

2019 में वर्तमान राष्ट्रपति गोटबाया राजपक्षे ने टैक्स में कटौती का लोकलुभावन दांव खेला, लेकिन इससे श्रीलंका की अर्थव्यवस्था को नुकसान पहुंचा। एक अनुमान के मुताबिक, इससे श्रीलंका की टैक्स से कमाई में 30% तक कमी आई, यानी सरकारी खजाना खाली होने लगा।

1990 में श्रीलंका की GDP में टैक्स से कमाई की हिस्सा 20% था, जो 2020 में घटकर महज 10% रह गया। टैक्स में कटौती के राजपक्षे के फैसले से 2019 के मुकाबले 2020 में टैक्स कलेक्शन में भारी गिरावट आई।

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