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डेढ़ साल तक फरार आरोपी आखिर किसके संरक्षण में थे? हाईकोर्ट की सख्ती के बाद गिरफ्तारी, पुलिस की कार्यप्रणाली पर बड़े सवाल

हत्या के प्रयास के मामले में हाईकोर्ट ने मांगा पुलिस से जवाब; 10-10 हजार के इनामी आरोपी गिरफ्तार, अब सवाल—इतने लंबे समय तक पुलिस की पकड़ से बाहर कैसे रहे?

जबलपुर। हत्या के प्रयास जैसे गंभीर मामले में करीब डेढ़ साल तक फरार रहे आरोपियों की गिरफ्तारी के बाद पूरे मामले ने नया मोड़ ले लिया है। एक तरफ पुलिस अब कपिल साहू और संदीप उर्फ सेंडी बरमैया को भोपाल से गिरफ्तार करने की बात कह रही है, वहीं दूसरी तरफ इसी मामले में पहले मध्यप्रदेश हाईकोर्ट द्वारा पुलिस की कार्रवाई पर सवाल उठाए जाने से पुलिस की कार्यप्रणाली भी कटघरे में है। सबसे बड़ा सवाल यही है कि अगर आरोपी इतने गंभीर मामले में फरार थे और उनके ऊपर इनाम तक घोषित था, तो आखिर वे इतने लंबे समय तक पुलिस की पहुंच से बाहर कैसे रहे?

हाईकोर्ट में पहुंचा मामला, पुलिस अधिकारियों को नोटिस
मामले को लेकर शंकर लाल गुनानी की ओर से हाईकोर्ट में याचिका दायर की गई थी। याचिका में आरोप लगाया गया कि हत्या के प्रयास के मामले में आरोपी संदीप उर्फ सेंडी बरमैया के खिलाफ कार्रवाई नहीं की गई और गिरफ्तारी वारंट तथा इनाम घोषित होने के बावजूद वह लंबे समय तक पुलिस की पकड़ से बाहर रहा। याचिकाकर्ता की ओर से पुलिस को शिकायतें देने और कार्रवाई नहीं होने के आरोप भी लगाए गए।

इन आरोपों पर सुनवाई करते हुए हाईकोर्ट ने मंडला पुलिस अधीक्षक, बम्हनी थाना प्रभारी, जबलपुर पुलिस अधीक्षक और बरेला थाना प्रभारी सहित संबंधित अधिकारियों को नोटिस जारी कर जवाब मांगा। न्यायालय ने फरार आरोपियों कपिल साहू, संदीप उर्फ सेंडी बरमैया और राहुल पटेल के संबंध में अब तक की कार्रवाई और गिरफ्तारी के प्रयासों का विवरण प्रस्तुत करने के निर्देश दिए।

अब सवाल—किसके संरक्षण में थे आरोपी?
यही इस पूरे मामले का सबसे बड़ा सवाल है। कपिल साहू और संदीप उर्फ सेंडी बरमैया अगर पुलिस के मुताबिक लंबे समय से फरार थे, तो उन्होंने डेढ़ साल के दौरान कहां-कहां शरण ली? किसके संपर्क में रहे? किसके सहयोग से लगातार ठिकाने बदलते रहे? क्या किसी स्थानीय व्यक्ति, प्रभावशाली व्यक्ति या किसी अन्य नेटवर्क ने उन्हें मदद पहुंचाई?

इन सवालों का जवाब जांच के दौरान सामने आना जरूरी है। बिना ठोस पुलिस या न्यायालयीन साक्ष्य के किसी व्यक्ति को आरोपियों का संरक्षक बताना उचित नहीं होगा, लेकिन अगर आरोपियों को किसी ने छिपने, आने-जाने या आर्थिक मदद देने में सहयोग किया है, तो उस भूमिका की भी जांच होनी चाहिए।

10-10 हजार का इनाम, फिर भी गिरफ्तारी में इतनी देरी क्यों?
पुलिस के मुताबिक दोनों आरोपियों पर 10-10 हजार रुपये का इनाम घोषित था। इसके बावजूद करीब डेढ़ साल तक गिरफ्तारी नहीं हो पाना पुलिस की निगरानी और गिरफ्तारी तंत्र पर गंभीर सवाल खड़े करता है। क्या पुलिस ने आरोपियों के संभावित ठिकानों की नियमित निगरानी की? क्या उनके मोबाइल नंबर, सोशल मीडिया और संपर्कों की जांच की गई? क्या उनके परिवार और करीबी लोगों से पूछताछ हुई? अगर यह सब हुआ तो आरोपी लगातार पुलिस से बचते कैसे रहे?

भोपाल के होटल से गिरफ्तारी का पुलिस का दावा,
अब पुलिस का कहना है कि साइबर सेल और मुखबिर तंत्र से मिले इनपुट के आधार पर दोनों आरोपियों के भोपाल में होने की जानकारी मिली। इसके बाद पुलिस टीम ने कार्रवाई करते हुए उन्हें एक होटल से गिरफ्तार किया। पुलिस के अनुसार आरोपियों के कब्जे से घटना में प्रयुक्त स्कॉर्पियो एन और स्विफ्ट डिजायर कार भी जब्त की गई हैं।

इस कार्रवाई में निरीक्षक संगीता सिंह, उपनिरीक्षक शशिकला उइके, सहायक उपनिरीक्षक देवेन्द्र प्रजापति, प्रधान आरक्षक ओमनारायण सिंह, प्रधान आरक्षक मुकेश मसराम, आरक्षक विशाल, आरक्षक रवि शर्मा, साइबर सेल आरक्षक संदीप पाण्डेय और आरक्षक राहुल कुलस्ते की भूमिका बताई गई है।

पुलिस कार्रवाई हुई, लेकिन पुराने सवाल अभी जिंदा हैं,
गिरफ्तारी के बाद पुलिस अपनी कार्रवाई को सफलता बता सकती है, लेकिन हाईकोर्ट में उठे सवालों का जवाब अभी बाकी है। अगर शंकर लाल गुनानी को पुलिस की कार्रवाई पर सवाल उठाते हुए न्यायालय की शरण लेनी पड़ी, तो यह भी जांच का विषय है कि शिकायतों पर पहले क्या कार्रवाई हुई थी।

अब जांच सिर्फ आरोपियों की गिरफ्तारी तक सीमित नहीं रहनी चाहिए। यह भी सामने आना चाहिए कि कपिल साहू, संदीप उर्फ सेंडी बरमैया और मामले में नाम सामने आए राहुल पटेल लंबे समय तक कहां रहे, किन लोगों के संपर्क में रहे और क्या किसी ने उन्हें कानून से बचाने में मदद की।

पीड़ित का बड़ा सवाल—गिरफ्तारी के साथ संरक्षण देने वालों तक पहुंचेगी जांच?
इस पूरे मामले में पुलिस के सामने सबसे बड़ी चुनौती अब यही है कि सिर्फ आरोपियों को गिरफ्तार करना पर्याप्त है या नहीं। यदि जांच में यह सामने आता है कि फरार आरोपियों को किसी व्यक्ति ने जानबूझकर संरक्षण, आर्थिक सहायता या छिपने की जगह उपलब्ध कराई, तो उस व्यक्ति की भूमिका पर भी कानूनी कार्रवाई होनी चाहिए।

फिलहाल किसी व्यक्ति को आरोपियों का संरक्षक बताना जांच पूरी होने से पहले उचित नहीं होगा। लेकिन हाईकोर्ट में उठे सवालों और डेढ़ साल तक आरोपियों के फरार रहने की परिस्थितियों को देखते हुए यह सवाल जरूर खड़ा होता है—आखिर कपिल साहू और संदीप उर्फ सेंडी बरमैया इतने लंबे समय तक किसके सहारे कानून की पकड़ से दूर रहे?

अब हाईकोर्ट में पुलिस का जवाब और जांच की अगली कार्रवाई ही बताएगी कि यह केवल पुलिस की गिरफ्तारी में देरी थी या आरोपियों को कहीं से ऐसा सहयोग मिल रहा था, जिसने उन्हें लंबे समय तक कानून से दूर रहने में मदद की।

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