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नन्हे कंधों पर कांवड़, नंगे पांव संस्कारों की राह! 11 साल के प्रार्थ और 7 साल की प्रान्या ने दिखाई नई पीढ़ी को आस्था की राह

मोबाइल की दुनिया में खोते बचपन के बीच सेन परिवार के इन नन्हे बच्चों ने निभाई परंपरा—नन्हे कदमों से तय किया लंबा सफर, गेबी नाथ मंदिर पहुंचकर चढ़ाई कांवड़

जबलपुर आज का दौर तेजी से बदल रहा है। बच्चों का बचपन मोबाइल, इंटरनेट और आधुनिक जीवनशैली के बीच कहीं सिमटता जा रहा है। ऐसे समय में जब कई बच्चे अपने परिवार की परंपराओं और संस्कारों से धीरे-धीरे दूर होते नजर आते हैं, जबलपुर के गड़ा थाना क्षेत्र के रहने वाले सेन परिवार के दो मासूम बच्चों—11 वर्षीय प्रार्थ सेन और 7 वर्षीय प्रान्या सेन ने अपनी आस्था और हौसले से एक खूबसूरत मिसाल पेश की है। इन दोनों बच्चों ने भगवान भोलेनाथ की भक्ति में कांवड़ उठाई और नंगे पांव पैदल लंबा सफर तय कर गेबी नाथ मंदिर पहुंचे।

उम्र छोटी, लेकिन संस्कारों की जड़ें मजबूत,
प्रार्थ और प्रान्या की कहानी केवल एक कांवड़ यात्रा की कहानी नहीं है। यह उन संस्कारों की तस्वीर है, जो परिवार से बच्चों तक पहुंचते हैं और फिर आने वाली पीढ़ी को अपनी संस्कृति से जोड़ते हैं। महज 11 साल के प्रार्थ और 7 साल की प्रान्या ने अपने नन्हे कंधों पर कांवड़ रखी तो उनके साथ केवल धार्मिक परंपरा नहीं चल रही थी, बल्कि परिवार की आस्था और संस्कार भी आगे बढ़ रहे थे। दोनों बच्चों का यह संकल्प बताता है कि यदि बच्चों को संस्कारों से जोड़ा जाए तो वे अपनी परंपराओं को पूरे उत्साह के साथ आगे बढ़ा सकते हैं।

नंगे पांव चले, रास्ता लंबा था… लेकिन हौसला नहीं टूटा,
कांवड़ यात्रा के दौरान प्रार्थ और प्रान्या ने नंगे पैर पैदल सफर तय किया। रास्ते की कठिनाई, थकान और पैरों में होने वाली तकलीफ के बावजूद दोनों बच्चों के कदम अपनी मंजिल की ओर बढ़ते रहे। उनके कंधों पर कांवड़ थी और मन में भगवान शिव के प्रति श्रद्धा। यह दृश्य अपने आप में बेहद भावुक था—एक तरफ उम्र महज 7 और 11 साल, दूसरी तरफ लंबा पैदल सफर। लेकिन दोनों बच्चों ने अपने संकल्प को पूरा करने का हौसला दिखाया।

प्रार्थ और प्रान्या की जोड़ी ने दिया नई पीढ़ी को संदेश,
आज बच्चों के हाथों में मोबाइल फोन होना सामान्य बात है। आधुनिक तकनीक जरूरी भी है, लेकिन उसके साथ अपनी संस्कृति, परिवार और संस्कारों से जुड़े रहना भी उतना ही महत्वपूर्ण है। प्रार्थ सेन और प्रान्या सेन ने किसी आधुनिक चीज का विरोध नहीं किया, बल्कि यह दिखाया कि आधुनिक दौर में रहते हुए भी अपनी परंपराओं को जीवित रखा जा सकता है। उनका यह कदम उन परिवारों के लिए भी संदेश है जो चाहते हैं कि उनके बच्चे अपनी संस्कृति और पारिवारिक मूल्यों को समझें और आगे बढ़ाएं।

भाई-बहन ने कदम से कदम मिलाकर पूरी की यात्रा,
इस यात्रा की खूबसूरती यह भी रही कि 11 वर्षीय प्रार्थ सेन और 7 वर्षीय प्रान्या सेन ने एक-दूसरे का साथ नहीं छोड़ा। भाई-बहन के रूप में दोनों ने कदम से कदम मिलाकर सफर पूरा किया। छोटी बहन प्रान्या का उत्साह देखकर आसपास मौजूद लोग भी प्रभावित हुए। वहीं प्रार्थ ने भी अपनी जिम्मेदारी और संकल्प के साथ यात्रा पूरी की। दोनों बच्चों की यह जोड़ी केवल एक परिवार की खुशी नहीं, बल्कि उन संस्कारों की तस्वीर बन गई जिन्हें अगली पीढ़ी तक पहुंचाना जरूरी है।

गेबी नाथ मंदिर पहुंचकर पूरी हुई आस्था की यात्रा,
लंबा सफर तय करने के बाद जब दोनों बच्चे गेबी नाथ मंदिर पहुंचे तो उनके चेहरे पर यात्रा पूरी होने की खुशी साफ दिखाई दे रही थी। भगवान भोलेनाथ के दर्शन कर दोनों ने श्रद्धा के साथ कांवड़ अर्पित की। परिवार के लिए यह पल निश्चित रूप से गर्व और भावुकता से भरा रहा होगा। बच्चों ने जिस संकल्प के साथ यात्रा शुरू की थी, उसे पूरा कर यह साबित किया कि हौसला उम्र का मोहताज नहीं होता।

संस्कार केवल शब्द नहीं, उन्हें जीवन में उतारना भी जरूरी,
प्रार्थ और प्रान्या की यह यात्रा एक महत्वपूर्ण सवाल भी सामने रखती है—क्या हम अपने बच्चों को केवल आधुनिक शिक्षा और तकनीक दे रहे हैं या उन्हें अपने संस्कारों और परंपराओं से भी जोड़ रहे हैं? संस्कार किसी किताब के पन्नों में लिखी चीज नहीं हैं। वे परिवार के व्यवहार, परंपराओं और बड़ों के उदाहरण से बच्चों तक पहुंचते हैं। इन दोनों बच्चों ने अपनी छोटी सी यात्रा के माध्यम से यही संदेश दिया कि संस्कारों को केवल याद करना नहीं, उन्हें आगे बढ़ाना भी हमारी जिम्मेदारी है।

नन्हे कदमों से बड़ी सीख,
प्रार्थ सेन और प्रान्या सेन के नन्हे कदमों ने शायद यह साबित कर दिया कि आज भी बच्चों के भीतर अपनी संस्कृति और परंपरा के प्रति प्रेम जगाया जा सकता है। जरूरत केवल उन्हें सही दिशा दिखाने की है। इन बच्चों की आस्था किसी दूसरे बच्चे को भी अपने परिवार, अपनी संस्कृति और अपने संस्कारों के बारे में जानने के लिए प्रेरित कर सकती है।

बेशक, बच्चों की लंबी धार्मिक यात्राओं में परिवार की निगरानी, पर्याप्त पानी, आराम और स्वास्थ्य का ध्यान रखना बेहद जरूरी है। आस्था के साथ बच्चों की सुरक्षा सर्वोच्च प्राथमिकता होनी चाहिए

नन्हे कंधों पर कांवड़ थी, लेकिन साथ चल रहे थे संस्कार।
गढ़ा थाना क्षेत्र के सेन परिवार के 11 वर्षीय प्रार्थ सेन और 7 वर्षीय प्रान्या सेन ने नंगे पांव लंबा सफर तय कर केवल गेबी नाथ मंदिर तक पहुंचने का रास्ता नहीं बनाया, बल्कि अपनी आस्था, परिवार के संस्कार और परंपरा को आगे ले जाने की एक खूबसूरत राह भी दिखाई।

इन बच्चों के नन्हे कदमों को सलाम… इनके हौसले को सलाम… और उन संस्कारों को नमन, जो आज भी नई पीढ़ी के भीतर जीवित हैं।

हर हर महादेव! 🔱🕉️🙏

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