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मेडिकल अस्पताल में ‘काले कपड़ों’ का राज क्या? बिना यूनिफॉर्म सिक्योरिटी गार्ड और बाउंसर किसकी सुरक्षा कर रहे—डॉक्टरों की या दिखा रहे दबदबा?

डीन ने सिक्योरिटी बदलने की बात कही, लेकिन कैजुअल्टी में आज भी बिना वर्दी नजर आ रहे सुरक्षाकर्मी—मरीजों की सुरक्षा पर बड़ा सवाल

जबलपुर। नेताजी सुभाष चंद्र बोस मेडिकल कॉलेज एवं अस्पताल की कैजुअल्टी में सुरक्षा व्यवस्था को लेकर एक बार फिर सवाल खड़े हो रहे हैं। हाल ही में डॉक्टरों और मरीज के साथ आए युवकों के बीच हुए विवाद के बाद अस्पताल प्रशासन ने सुरक्षा व्यवस्था में बदलाव की बात कही थी। डीन नवनीत सक्सेना के अनुसार पुराने सिक्योरिटी गार्डों को हटाकर नई सुरक्षा टीम कैजुअल्टी में तैनात की गई है। लेकिन अस्पताल की जमीनी तस्वीर में आज भी ऐसे लोग नजर आते हैं जो बिना निर्धारित यूनिफॉर्म और काले कपड़ों में सुरक्षा व्यवस्था संभालते दिखाई देते हैं।
आखिर काले कपड़ों का राज क्या है?
सबसे बड़ा सवाल यही है कि मेडिकल अस्पताल में काले कपड़े पहनकर घूमने वाले ये लोग आखिर हैं कौन? क्या ये अधिकृत सिक्योरिटी गार्ड हैं? क्या ये बाउंसर हैं? क्या इन्हें अस्पताल प्रशासन ने इसी ड्रेस कोड में ड्यूटी करने की अनुमति दी है? अगर अनुमति है तो आम मरीज और उसके परिजन इन्हें पहचानेंगे कैसे?
अस्पताल जैसे संवेदनशील स्थान पर सुरक्षा कर्मचारी की पहचान स्पष्ट होना बेहद जरूरी है। यूनिफॉर्म, पहचान-पत्र और अधिकृत बैज से मरीजों और उनके परिजनों को यह पता चलता है कि सुरक्षा व्यवस्था में कौन व्यक्ति अधिकृत है। लेकिन अगर सुरक्षाकर्मी ही आम कपड़ों में नजर आएं तो सवाल उठना स्वाभाविक है कि अस्पताल में सुरक्षा की जिम्मेदारी आखिर किसके हाथ में है।
बिना यूनिफॉर्म सिक्योरिटी—सुरक्षा या दबदबा?
सुरक्षा कर्मचारी का काम अस्पताल में व्यवस्था बनाए रखना, मरीजों और डॉक्टरों की सुरक्षा करना तथा विवाद की स्थिति में कानून के दायरे में रहते हुए स्थिति को नियंत्रित करना है। लेकिन अगर कोई सुरक्षाकर्मी बिना वर्दी के काले कपड़ों में खड़ा हो और उसकी पहचान ही स्पष्ट न हो, तो मरीज के परिजनों में भ्रम पैदा होना स्वाभाविक है।
यही वजह है कि सवाल उठ रहा है—क्या ये लोग वास्तव में सुरक्षा व्यवस्था संभाल रहे हैं या कैजुअल्टी में अपना दबदबा कायम करने के लिए तैनात किए गए हैं?
यह आरोप नहीं, बल्कि अस्पताल प्रशासन से पूछा जाने वाला सवाल है। यदि सभी सुरक्षा कर्मचारी नियमों के मुताबिक काम कर रहे हैं, तो उनकी स्पष्ट पहचान और ड्रेस कोड क्यों नहीं दिखाई देता?
डॉक्टरों की सुरक्षा जरूरी, लेकिन मरीज भी सुरक्षित रहें,
मेडिकल अस्पताल में डॉक्टरों और कर्मचारियों के साथ मारपीट की घटनाएं गंभीर चिंता का विषय हैं। डॉक्टरों को सुरक्षित वातावरण मिलना जरूरी है, लेकिन सुरक्षा के नाम पर मरीज और उनके परिजनों के साथ किसी भी तरह का दुर्व्यवहार स्वीकार नहीं किया जा सकता।
सिक्योरिटी गार्ड या बाउंसर का काम डॉक्टर की सुरक्षा के साथ-साथ मरीजों और उनके परिजनों की सुरक्षा सुनिश्चित करना भी होना चाहिए। सुरक्षा व्यवस्था ऐसी होनी चाहिए जिसमें किसी विवाद को बातचीत और निर्धारित प्रोटोकॉल के जरिए नियंत्रित किया जाए, न कि सुरक्षाकर्मियों की पहचान और भूमिका ही सवालों के घेरे में आ जाए।
क्या अस्पताल प्रशासन रोजाना सिक्योरिटी की जांच करता है?
अब सवाल अस्पताल के जिम्मेदार अधिकारियों से है—क्या कैजुअल्टी में तैनात प्रत्येक सिक्योरिटी गार्ड का सत्यापन किया जाता है? क्या उनकी ड्यूटी, यूनिफॉर्म और पहचान-पत्र की रोजाना जांच होती है? क्या बाउंसरों की अलग से अधिकृत सूची है? क्या उनके लिए कोई ड्रेस कोड और आचार संहिता निर्धारित है?
और सबसे महत्वपूर्ण सवाल—अगर यूनिफॉर्म अनिवार्य है तो बिना यूनिफॉर्म काले कपड़ों में ड्यूटी करने वाले लोगों पर कार्रवाई क्यों नहीं होती?
डीन नवनीत सक्सेना के दावे की भी होनी चाहिए जमीनी समीक्षा,
अस्पताल के डीन नवनीत सक्सेना की ओर से सुरक्षा व्यवस्था बदलने की बात कही गई है। ऐसे में अस्पताल प्रशासन को यह भी स्पष्ट करना चाहिए कि नई सुरक्षा एजेंसी या नए गार्डों के लिए क्या ड्रेस कोड निर्धारित किया गया है और उसकी निगरानी कौन करता है।
अगर काले कपड़े अधिकृत ड्रेस हैं तो अस्पताल प्रशासन को इसका नियम सार्वजनिक करना चाहिए। और यदि काले कपड़ों में ड्यूटी करना नियमों के खिलाफ है, तो बिना यूनिफॉर्म नजर आने वाले सुरक्षाकर्मियों पर कार्रवाई क्यों नहीं की जा रही—यह भी स्पष्ट होना चाहिए।
बड़ा सवाल—मेडिकल में सुरक्षा का सिस्टम आखिर किसके लिए?
मेडिकल अस्पताल में सुरक्षा डॉक्टरों की भी होनी चाहिए और मरीजों की भी। सुरक्षा व्यवस्था का उद्देश्य भय पैदा करना नहीं, बल्कि भरोसा पैदा करना होना चाहिए। मरीज पहले ही बीमारी, दुर्घटना या परेशानी की स्थिति में अस्पताल पहुंचता है। उसे ऐसे सुरक्षाकर्मियों की जरूरत है जिनकी पहचान स्पष्ट हो और जिनसे वह जरूरत पड़ने पर मदद मांग सके।
काले कपड़े पहनकर कैजुअल्टी में घूमने वाले लोग आखिर हैं कौन?
सिक्योरिटी गार्ड हैं तो यूनिफॉर्म क्यों नहीं?
बाउंसर हैं तो उनकी भूमिका क्या है?
क्या उन्हें डॉक्टरों की सुरक्षा के लिए लगाया गया है या मरीजों पर दबदबा बनाने के लिए?
और अगर सब कुछ नियम के मुताबिक है तो मेडिकल अस्पताल प्रशासन इन सवालों का स्पष्ट जवाब क्यों नहीं देता?
जबलपुर का सवाल सीधा है—मेडिकल अस्पताल में सुरक्षा चाहिए, लेकिन सुरक्षा के नाम पर अस्पष्ट पहचान और मनमानी नहीं। डॉक्टरों की सुरक्षा के साथ मरीजों की गरिमा और अधिकारों की सुरक्षा भी उतनी ही जरूरी है।

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