महाकौशल के सबसे बड़े सरकारी अस्पताल में ₹1.63 करोड़ का कथित गबन! कैश शाखा के 5 कर्मचारी आरोपी, अब सवाल—मास्टरमाइंड कौन?
महाकौशल के सबसे बड़े सरकारी अस्पताल में ₹1.63 करोड़ का कथित गबन! कैश शाखा के 5 कर्मचारी आरोपी—अब सवाल, इतनी बड़ी रकम पर मेडिकल प्रशासन की क्यों नही पड़ी नजर? MRB से बैंक खाते तक पहुंचते-पहुंचते करोड़ों का हिसाब बदला? 5 कर्मचारियों पर FIR, मेडिकल की निगरानी व्यवस्था पर भी गंभीर सवाल

जबलपुर। नेताजी सुभाषचंद्र बोस चिकित्सा महाविद्यालय एवं अस्पताल की कैश शाखा से सामने आया कथित वित्तीय गड़बड़ी का मामला अब गंभीर सवाल खड़े कर रहा है। सरकारी अस्पताल में मरीजों, छात्रों और अन्य मदों से प्राप्त होने वाली राशि के हिसाब में 1 करोड़ 63 लाख 78 हजार 456 रुपये का अंतर पाए जाने के बाद गढ़ा थाना पुलिस ने पांच कर्मचारियों के खिलाफ धोखाधड़ी, गबन और आपराधिक षड्यंत्र से जुड़ी धाराओं में मामला दर्ज किया है।
मामले की शुरुआत मेडिकल कॉलेज के अधिष्ठाता डॉ. नवनीत सक्सेना की शिकायत से हुई। शिकायत में बताया गया कि कैश अनुभाग में छात्र फीस, IPD, OPD और अन्य मदों से नगद राशि मनी रसीद बुक यानी MRB के माध्यम से प्राप्त की जाती है। यह राशि निर्धारित मरीज खाते और फीस खाते में जमा की जानी होती है। लेकिन संस्थान के प्रशासकीय अधिकारी द्वारा खातों की विस्तृत जांच किए जाने के बाद MRB से प्राप्त राशि और बैंक खातों में जमा राशि के बीच बड़ा अंतर सामने आया।
अप्रैल 2020 से नवंबर 2025 तक का हिसाब जांच के घेरे में,
प्रारंभिक आंतरिक जांच में सामने आया कि कथित वित्तीय अंतर अप्रैल 2020 से नवंबर 2025 के बीच की अवधि से जुड़ा है। इस दौरान कैश अनुभाग में अलग-अलग समय पर पांच कर्मचारी पदस्थ रहे।
इनमें मनोहर केवट, जो वर्ष 2016 से 31 जुलाई 2022 तक कैशियर के रूप में पदस्थ रहे, साधना चंद्रौल, जो 26 अक्टूबर 2021 से नवंबर 2025 तक कैशियर रहीं, भानू सिंह शाक्यवार, जो 2007 से 3 सितंबर 2021 तक सहायक ग्रेड-3 रहे, अरविन्द धुर्वे, जो जून 2019 से 6 मई 2026 तक कैशियर सह प्रभारी के रूप में पदस्थ रहे और विशाल सराठे, जो अगस्त 2021 से 6 मई 2026 तक सहायक ग्रेड-3 के पद पर पदस्थ रहे। पुलिस ने इन्हीं पांच कर्मचारियों के खिलाफ मामला दर्ज किया है।
मरीज खाते के रिकॉर्ड ने बढ़ाए सवाल,
जांच में मरीज खाता क्रमांक 10080131819 से जुड़े रिकॉर्ड की भी जांच की गई। दस्तावेजों में विभिन्न कर्मचारियों और अन्य मदों से संबंधित MRB प्राप्तियों तथा बैंक में जमा रकम का विवरण दर्ज है।
रिकॉर्ड के अनुसार मनोहर केवट के नाम से ₹1,59,10,805 प्राप्त राशि और ₹87,92,725 बैंक जमा होने का उल्लेख है। भानू सिंह शाक्यवार के नाम से ₹89,76,620 प्राप्ति और ₹85,94,420 जमा बताया गया है।
इसी तरह अरविन्द धुर्वे के नाम से ₹2,25,68,697 प्राप्त राशि और ₹86,59,435 बैंक जमा, जबकि साधना चंद्रौल के नाम से ₹5,73,70,428 प्राप्ति और ₹1,76,10,080 जमा होने का विवरण दिया गया है।
विशाल सराठे के नाम से ₹7,36,68,332 प्राप्त राशि और ₹8,89,00,975 जमा होने का रिकॉर्ड दर्ज है। इसके अलावा विजय कुडे, हेमंत बैगा और अस्पष्ट हस्ताक्षर वाली रसीदों से जुड़ी प्रविष्टियां भी जांच का हिस्सा हैं।
दस्तावेजों में मरीज खाते की तालिका में कुल ₹17,88,48,932 की MRB प्राप्त राशि और ₹16,56,87,664 बैंक में जमा राशि का उल्लेख है।
फीस खाते में भी सामने आया अंतर,
मामला केवल मरीज खाते तक सीमित नहीं है। फीस खाता क्रमांक 1008132574 की जांच में भी कर्मचारियों से जुड़ी प्राप्तियों और बैंक में जमा रकम का विवरण सामने आया।
रिकॉर्ड के अनुसार मनोहर केवट के नाम से ₹8,67,203 की प्राप्त राशि के सामने बैंक जमा शून्य बताया गया है। भानू सिंह शाक्यवार के नाम से ₹2,13,685 प्राप्ति और ₹50,317 जमा, जबकि अरविन्द धुर्वे के नाम से ₹20,44,692 प्राप्ति और ₹3,29,701 जमा होने का उल्लेख है।
वहीं साधना चंद्रौल के नाम से ₹27,52,565 प्राप्त राशि और बैंक में जमा शून्य बताया गया है। विशाल सराठे के नाम से ₹27,57,029 प्राप्ति और ₹40,07,468 बैंक में जमा होने का रिकॉर्ड सामने आया है।
इन आंकड़ों के आधार पर दोनों खातों के तुलनात्मक अध्ययन में ₹1,63,78,456 का कथित वित्तीय अंतर सामने आने की बात शिकायत में कही गई है।
पांच सरकारी कर्मचारियों पर FIR,
मेडिकल कॉलेज प्रशासन की शिकायत के आधार पर गढ़ा थाना पुलिस ने मनोहर केवट, साधना चंद्रौल, भानू सिंह शाक्यवार, अरविन्द धुर्वे और विशाल सराठे के खिलाफ BNS की धारा 318(4), 316(5) और 61(2) के तहत मामला दर्ज कर जांच शुरू की है।
पुलिस की जांच अब इस बात पर केंद्रित है कि कैश शाखा में राशि प्राप्त करने से लेकर उसे बैंक में जमा करने तक की प्रक्रिया क्या थी और कथित अंतर किस स्तर पर पैदा हुआ।
करोड़ों का अंतर, लेकिन मेडिकल प्रशासन की निगरानी कहां थी?
इस पूरे मामले में सबसे बड़ा सवाल मेडिकल कॉलेज प्रशासन की निगरानी व्यवस्था को लेकर है। अगर कैश शाखा में रोजाना छात्र फीस, OPD, IPD और मरीजों से संबंधित राशि का लेन-देन होता था तो MRB और बैंक खातों का नियमित मिलान क्यों नहीं हुआ?
अगर रिकॉर्ड में इतनी बड़ी राशि का अंतर था, तो क्या कैश बुक और बैंक स्टेटमेंट का समय-समय पर ऑडिट नहीं किया गया? क्या संबंधित अधिकारियों ने कैश का भौतिक सत्यापन किया? क्या वरिष्ठ स्तर पर रिपोर्टिंग की व्यवस्था कमजोर थी?
यह सवाल इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि शिकायत के मुताबिक कथित वित्तीय अंतर कई वर्षों की अवधि से जुड़ा हुआ है।
मास्टरमाइंड कौन? जांच में सामने आएगा असली सच,
अब पुलिस के सामने सबसे बड़ा सवाल यह है कि क्या यह मामला केवल पांच कर्मचारियों की कथित भूमिका तक सीमित है या इसके पीछे कोई बड़ा नेटवर्क है।
कौन MRB जारी करता था? कौन नगद राशि प्राप्त करता था? बैंक में जमा करने की जिम्मेदारी किसकी थी? कैश का रोजाना मिलान कौन करता था? बैंक जमा की पुष्टि कौन करता था?
इन सवालों के जवाब मिलने के बाद ही यह स्पष्ट हो सकेगा कि इस पूरे मामले में किसकी क्या भूमिका रही।
फिलहाल उपलब्ध FIR में किसी एक व्यक्ति को मास्टरमाइंड घोषित नहीं किया गया है। इसलिए जांच पूरी होने से पहले किसी अधिकारी या कर्मचारी को मास्टरमाइंड बताना उचित नहीं होगा। लेकिन ₹1.63 करोड़ के कथित अंतर ने मेडिकल कॉलेज की वित्तीय निगरानी व्यवस्था पर गंभीर सवाल जरूर खड़े कर दिए हैं।
अस्पताल प्रशासन के लिए भी अग्निपरीक्षा,
नेताजी सुभाषचंद्र बोस चिकित्सा महाविद्यालय एवं अस्पताल प्रदेश के प्रमुख सरकारी चिकित्सा संस्थानों में शामिल है। ऐसे संस्थान की कैश शाखा में इतनी बड़ी कथित वित्तीय अनियमितता सामने आना केवल कर्मचारियों की भूमिका का सवाल नहीं, बल्कि पूरी आंतरिक नियंत्रण व्यवस्था की जांच का विषय है।
अब देखना होगा कि पुलिस जांच में कथित गबन की पूरी कड़ी सामने आती है या नहीं और क्या इस मामले में किसी अन्य कर्मचारी या अधिकारी की भूमिका भी सामने आती है।
फिलहाल मनोहर केवट, साधना चंद्रौल, भानू सिंह शाक्यवार, अरविन्द धुर्वे और विशाल सराठे के खिलाफ मामला दर्ज है। गढ़ा थाना पुलिस दस्तावेजों और बैंक रिकॉर्ड के आधार पर जांच आगे बढ़ा रही है।
एक करोड़ 63 लाख 78 हजार 456 रुपये के कथित अंतर ने मेडिकल कॉलेज की कैश व्यवस्था पर बड़ा सवाल खड़ा कर दिया है—अगर अस्पताल के अंदर ही सरकारी रकम के हिसाब में इतना बड़ा अंतर पैदा हो सकता है, तो इसकी जिम्मेदारी तय करने की जवाबदेही आखिर किसकी है?



