20 फरवरी को ”घूसखोर पंडत” फिल्म के टाइटल को लेकर नेटफ्लिक्स के और नीरज पांडे पर के विरूद्ध आपराधिक मानहानि के प्रकरण पर जेएमएफसी न्यायालय में दर्ज होंगे परिवादी के बयान…

 20 फरवरी को ”घूसखोर पंडत” फिल्म के टाइटल को लेकर नेटफ्लिक्स के और नीरज पांडे पर के विरूद्ध आपराधिक मानहानि के प्रकरण पर जेएमएफसी न्यायालय में दर्ज होंगे परिवादी के बयान…
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सेटन्यूज़, जबलपुर। प्रारम्भिक सुनवाई में जे एम एफ सी न्यायालय ने किया आदेश तर्क दिया – सुप्रीम कोर्ट ने भी माना “घूसखोर पंडत” अपमानजनक, पर अपराध घटित हो चुका है नेटफ्लिक्स के यू एस ए स्थित चेयरमेन रीड हेस्टिंग्स, बेला बजरिया, बेला बजरिया चीफ कंटेंट ऑफिसर को भी बनाया प्रस्तावित अभियुक्त न्यायालय से संज्ञान लेकर भारत सरकार के विदेश मंत्रालय के द्वारा विदेशी अभियुक्तों को सम्मन जारी करने का भी किया अनुरोध जबलपुर। “घूसखोर पंडत “ फ़िल्म के निर्माता नीरज पाण्डेय और इसके ओटीटी पर प्रसारण अधिकार प्राप्त नेटफ्लिक्स के यू एस ए में स्थित प्रमुख और कंटेंट हेड और नेटफ्लिक्स के भारत में वितरक के विरूद्ध आपराधिक मान हानि का परिवाद न्यायिक दंडाधिकारी प्रथम श्रेणी के विरूद्ध प्रस्तुत किया है जिसमें प्रारम्भिक सुनवाई के बाद न्यायिक दंडाधिकारी प्रथम श्रेणी पंकज सविता ने 20 फरवरी की तिथि परिवादी के बयान दर्ज करने नियत की है . उल्लेखनीय है कि जबलपुर के स्थानीय निवासी एवं फिल्मी पटकथा लेखक, फ़िल्म कलाकार और ज्योतिषी पं. वैभव पाठक ने आगामी फिल्म ‘घूसखोर पंडित’ के टाइटल को ब्राह्मण समुदाय के प्रति अपमानजनक करार करते हुए यह मानहानि परिवाद प्रस्तुत किया है।

परिवादी पं. वैभव पाठक ने अपने परिवाद में आरोपित किया है कि वह मध्य प्रदेश की सबसे प्राचीन ब्राह्मण महासभा मध्य प्रदेश प्रगतिशील ब्राह्मण महासभा के सक्रिय सदस्य हैं, जो सम्पूर्ण मध्य प्रदेश के विप्रों की प्रतिनिधि संस्था है, जिसकी स्थापना भी पंडित मदन मोहन मालवीय ने की है। परिवाद में आरोपित किया है कि पंडित शब्द का अपभ्रंश लोक भाषा और ग्राम भाषा में “पंडत “ प्रचलित है। किन्तु इस फ़िल्म के निर्माता ने फिल्म के शीर्षक ‘घूसखोर पंडत’ के बहाने फ़िल्म की सस्ती और घटिया तरीके से प्रचार के लिए जानबूझकर ‘पंडत (पंडित)’ उपसर्ग को प्रयोग किया है जो इसे भ्रष्टाचार से जोड़ता है, जिससे संपूर्ण ब्राह्मण समुदाय की सामाजिक प्रतिष्ठा को आघात पहुंचा है। कोई वैश्विक कंपनी, जो भारत में व्यवसाय कर रही है, भारतीय समाज की संवेदनाओं को आघात पहुँचाने की अनुमति नहीं दी जा सकती है।

परिवाद में पांच नीरज पांडे फिल्म निर्माता व निर्देशक, रीड हेस्टिंग्स चेयरमैन, नेटफ्लिक्स, टेड सरंदास को-सीईओ, नेटफ्लिक्स, बेला बजरिया चीफ कंटेंट ऑफिसर, नेटफ्लिक्स, मोनिका शेरगिल कंटेंट हेड, नेटफ्लिक्स इंडिया को प्रस्तावित अभियुक्त बनाया गया है। प्रारम्भिक सुनवाई में तर्क: सर्वोच्च न्यायालय ने भी माना फ़िल्म का शीर्षक ब्राह्मण समुदाय के प्रति अपमानजनक है, पर अपराध घटित हो चुका है
प्रारम्भिक सुनवाई के दौरान अधिवक्ता असीम त्रिवेदी, आरके दीक्षित, पंकज तिवारी, अजय प्रजापति, विनीत टेहेनगुनिया, प्रशांत सिरमोलिया, शुभम पाटकर, अरविन्द सिंह चौहान ने तर्क दिया कि सर्वोच्च न्यायालय ने भी उक्त फ़िल्म के शीर्षक को अपमानजनक माना है और निर्माता को शीर्षक बदलने कहा है परंतु अभी तक ट्रेलरों, समाचार-पत्रों और सोशल मीडिया के माध्यम से इस शीर्षक का ऐसा व्यापक प्रचार हो चुका है और प्रतिष्ठा-हानि का अपराध पूर्णतया घटित हो चुका है। यह तर्क दिया गया कि शीर्षक बदला जा सकता है, पर शब्दों के शूल से समाज के मानस पर बने घाव नहीं मिटते और प्रतिष्ठा की क्षति की भी भरपाई नहीं की जा सकती है।

क्या है मामला ?
परिवाद के अनुसार, फिल्म के निर्माता नीरज पांडे ने इस टाइटल का सोशल मीडिया, इलेक्ट्रॉनिक मीडिया और अखबारों में व्यापक प्रचार किया। परिवाद के अनुसार शब्द केवल वर्णसमूह नहीं होते; वे संस्कार होते हैं, संस्कृति की छवि होते हैं, और जब वे किसी जाति, वर्ग अथवा समुदाय के गौरव से जुड़ जाते हैं, तब वे प्रतिष्ठा के प्रतीक बन जाते हैं। ‘पंडित’ शब्द ऐसा ही शब्द है—विद्या का विभूषण, वाणी का विनम्र अहं, और भारतीय मनीषा की अमिट छाप। इसी शब्द के अपभ्रंश ‘पंडत’ को जब ‘घूसखोर’ जैसे कलंक के साथ जोड़ा गया, तब एक फिल्म का शीर्षक केवल प्रचार का साधन न रहकर सामाजिक आघात का कारण बन गया। परिवादी का तर्क है कि ‘पंडित’ शब्द विद्वता, पुरोहिताई और धार्मिक पवित्रता का द्योतक है तथा ऐतिहासिक रूप से पंडित जवाहरलाल नेहरू और पंडित अटल बिहारी वाजपेयी जैसी विभूतियों के साथ सम्मानपूर्वक जुड़ा रहा है। जब ‘पंडित’ शब्द पंडित जवाहरलाल नेहरू और पंडित अटल बिहारी वाजपेयी जैसी विभूतियों के साथ जुड़ा हो, तब उसे ‘घूसखोर’ का विशेषण देना केवल भाषा का अतिक्रमण नहीं, अपितु इतिहास का अपमान है।

“इस सम्मानजनक शीर्षक के साथ ‘घूसखोर’ जैसा आपराधिक विशेषण जोड़ना सामूहिक कलंक के समान है। यह किसी विशिष्ट पात्र पर नहीं, बल्कि पूरे समुदाय पर लगाया गया आरोप है,” परिवाद में कहा गया है। भले ही आरोपी बाद में आक्रोश के चलते शीर्षक बदल दें, लेकिन हो चुकी प्रतिष्ठा की क्षति अपरिवर्तनीय है। परिवादी की ओर से अधिवक्ता असीम त्रिवेदी, आरके दीक्षित, पंकज तिवारी, अजय प्रजापति, विनीत टेहेनगुनिया, प्रशांत सिरमोलिया, शुभम पाटकर, अरविन्द सिंह चौहान आदि पैरवी कर रहे हैं।

satyajeet yadav

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