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मेडिकल के वाहन स्टैंड में किसका खेल? मरीजों से कथित वसूली, एंबुलेंस वालों की मिलीभगत और प्रबंधन की चुप्पी पर सवाल!

जबलपुर के नेताजी सुभाष चंद्र बोस मेडिकल अस्पताल में मरीजों और उनके परिजनों की परेशानी कम होने के बजाय वाहन स्टैंड की कथित मनमानी ने नए सवाल खड़े कर दिए हैं। आरोप है कि पार्किंग स्टैंड पर निर्धारित शुल्क के बावजूद मरीजों के परिजनों से मनमाने तरीके से अतिरिक्त रकम मांगी जाती है। इतना ही नहीं, प्राइवेट एंबुलेंस संचालकों और ड्राइवरों की भूमिका पर भी सवाल उठ रहे हैं।

₹10 की पर्ची, फिर मनमानी रकम की मांग क्यों?
आरोप है कि वाहन स्टैंड पर कार और बाइक के लिए निर्धारित शुल्क की पर्ची दी जाती है, लेकिन तय समय के बाद वाहन मालिकों से अतिरिक्त रकम मांगी जाती है। सवाल यह है कि अगर शुल्क अस्पताल प्रशासन द्वारा निर्धारित है, तो कर्मचारियों को उससे ज्यादा पैसा मांगने की अनुमति किसने दी? और अगर अनुमति नहीं है तो अब तक इस कथित वसूली पर प्रभावी कार्रवाई क्यों नहीं हुई?

पैसे देने से इनकार किया तो बदसलूकी के आरोप
शिकायतों में आरोप लगाया गया है कि मनमानी रकम देने से इनकार करने पर स्टैंड के कर्मचारियों द्वारा मरीजों और उनके परिजनों से कथित अभद्रता, धमकी और मारपीट तक की जाती है। यदि जांच में यह सही पाया जाता है तो यह केवल पार्किंग विवाद नहीं, बल्कि अस्पताल परिसर में मरीजों के साथ गंभीर दुर्व्यवहार का मामला बन सकता है।

एंबुलेंस संचालक और ड्राइवर भी सवालों के घेरे में
मामले का दूसरा पहलू प्राइवेट एंबुलेंस से जुड़ा है। आरोप है कि कुछ एंबुलेंस संचालक या ड्राइवर मरीजों के परिजनों से रकम लेकर वाहन स्टैंड तक पहुंचाते हैं। सवाल यह है कि अगर स्टैंड शुल्क एंबुलेंस से लिया जा रहा है, तो उसका वास्तविक नियम क्या है? क्या एंबुलेंस संचालक मरीजों के परिजनों से अतिरिक्त रकम वसूलकर स्टैंड संचालक को दे रहे हैं? यदि ऐसा है तो इसकी भी निष्पक्ष जांच जरूरी है।

मेडिकल प्रशासन की निगरानी पर बड़ा सवाल
अस्पताल परिसर में संचालित वाहन स्टैंड की निगरानी आखिर किसकी जिम्मेदारी है? यदि पार्किंग शुल्क को लेकर शिकायतें सामने आ रही हैं, तो मेडिकल अस्पताल प्रबंधन को यह स्पष्ट करना होगा कि स्टैंड संचालक को किन नियमों के तहत काम करने की अनुमति है और कर्मचारियों द्वारा वसूली की निगरानी कैसे की जाती है।

अधीक्षक डॉ. अरविंद शर्मा से सीधा सवाल—अब कार्रवाई कब?
मामला सामने आने के बाद डीन डॉ. नवनीत सक्सेना के निर्देश पर पार्किंग संचालक को नोटिस जारी किया गया है। वहीं अधीक्षक डॉ. अरविंद शर्मा ने भी मामले को संज्ञान में लेकर संचालक से स्पष्टीकरण मांगे जाने की बात कही है। अब सवाल है कि क्या केवल नोटिस देकर मामला खत्म होगा या कथित मनमानी करने वाले कर्मचारियों पर भी नियमानुसार कार्रवाई होगी?

किसके संरक्षण में फल-फूल रहा है वाहन स्टैंड?
सबसे बड़ा सवाल यही है—अगर पार्किंग स्टैंड पर नियमों से अलग जाकर पैसे मांगे जा रहे हैं, तो किसके संरक्षण में यह कथित मनमानी चल रही है? क्या स्टैंड संचालक अपने कर्मचारियों की गतिविधियों से अनजान है? क्या अस्पताल प्रशासन को इसकी जानकारी नहीं है? और अगर जानकारी है, तो कार्रवाई क्यों नहीं?

जांच हुई तो सामने आएगा पूरा सच,
मरीज और उनके परिजन अस्पताल इलाज कराने आते हैं, पार्किंग या एंबुलेंस के नाम पर कथित अतिरिक्त आर्थिक बोझ उठाने नहीं। इसलिए जरूरत है कि अधीक्षक डॉ. अरविंद शर्मा पूरे मामले की निष्पक्ष जांच कराएं। जांच में यदि पार्किंग संचालक, कर्मचारियों, एंबुलेंस संचालकों या ड्राइवरों की नियम विरुद्ध वसूली अथवा मिलीभगत सामने आती है, तो संबंधित लोगों पर नियमानुसार कार्रवाई होनी चाहिए।

अब देखना यह है कि मेडिकल अस्पताल प्रबंधन इस कथित वसूली पर कितनी सख्ती दिखाता है—क्या वाहन स्टैंड संचालक और मनमानी रकम मांगने वाले कर्मचारियों पर कार्रवाई होगी, या फिर मरीजों की मजबूरी के बीच कथित वसूली का यह खेल यूं ही चलता रहेगा?

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