जबलपुर का मेट्रो हॉस्पिटल या ‘लापरवाही का जंक्शन’? समाजसेवी आशीष ठाकुर की जान पर बनी, निष्पक्ष जांच की मांग
मेट्रो हॉस्पिटल या 'लापरवाही का जंक्शन'? समाजसेवी आशीष ठाकुर की जान पर बनी, निष्पक्ष जांच की मांग

जबलपुर। मरीजों की जान बचाना जिनका पहला धर्म होना चाहिए, जब वही अस्पताल असंवेदनशीलता और लापरवाही की हदें पार कर दे, तो सवाल उठना लाजमी है। संस्कारधानी जबलपुर के प्रतिष्ठित कहे जाने वाले मेट्रो हॉस्पिटल पर गंभीर चिकित्सकीय लापरवाही (Medical Negligence) और बंधक बनाने जैसी डिस्चार्ज प्रक्रिया के सनसनीखेज आरोप लगे हैं। यह गंभीर आरोप किसी और ने नहीं, बल्कि शहर के जाने-माने समाजसेवी और मोक्ष मानव सेवा समिति के संयोजक आशीष ठाकुर ने लगाए हैं, जो खुद इस अस्पताल की कथित बदइंतजामी का शिकार होकर वेंटिलेटर तक पहुंच गए थे।
दर्द मिटाने गए थे, अस्पताल ने दे दिया जिंदगी भर का दर्द,
मामला बीते 17 जुलाई 2026 का है, जब आशीष ठाकुर को पेट दर्द की शिकायत के बाद मेट्रो हॉस्पिटल में भर्ती कराया गया था। परिजनों का आरोप है कि अस्पताल में कदम रखते ही राहत की जगह आफत शुरू हो गई। इलाज के नाम पर उनके स्वास्थ्य के साथ ऐसा खिलवाड़ हुआ कि उनकी हालत सुधरने के बजाय लगातार बिगड़ती चली गई।
कैथेटर से बहता रहा खून, सोता रहा स्टाफ; एडमिनिस्ट्रेटर मयूर की मौन सहमति?
आरोप है कि इलाज के दौरान आशीष ठाकुर को जो कैथेटर लगाया गया था, उसमें भारी गड़बड़ी थी। कैथेटर लगाने के बाद से ही उन्हें लगातार इंटरनल ब्लीडिंग (रक्तस्राव) होने लगी। परिजनों ने चीख-चीखकर वहां मौजूद डॉक्टरों और नर्सिंग स्टाफ को इस जानलेवा ब्लीडिंग की जानकारी दी, लेकिन किसी ने सुध नहीं ली। सही समय पर खून का बहना न रोकने के कारण उनके शरीर में खून की भारी कमी हो गई। स्थिति इतनी गंभीर हो गई कि उन्हें आनन-फानन में आईसीयू और वेंटिलेटर सपोर्ट पर डालना पड़ा। परिजनों का कहना है कि जब इस अव्यवस्था की शिकायत शीर्ष स्तर पर करने की कोशिश की गई, तो पता चला कि अस्पताल के सारे फैसले एडमिनिस्ट्रेटर मयूर के दिशा-निर्देशों पर ही होते हैं, जो इस गंभीर लापरवाही पर भी पर्दा डालते रहे।
‘इंश्योरेंस’ का खेल और चंद घंटों की वो ‘क्रूर’ देरी,
जब परिजनों ने देखा कि मेट्रो हॉस्पिटल में आशीष ठाकुर की जान को सीधा खतरा है, तो उन्होंने तुरंत उन्हें किसी दूसरे अस्पताल ले जाने के लिए ‘डिस्चार्ज’ की मांग की। लेकिन अस्पताल की क्रूरता यहीं खत्म नहीं हुई। आरोप है कि जब मरीज वेंटिलेटर पर जिंदगी और मौत की जंग लड़ रहा था, तब अस्पताल प्रबंधन बीमा (इंश्योरेंस) की कागजी प्रक्रियाओं और पैसों के हिसाब-किताब का हवाला देकर परिजनों को कई घंटों तक दौड़ाता रहा। डिस्चार्ज में हुई इस जानबूझकर देरी ने मरीज को मौत के और करीब धकेल दिया।
मेडिकल कॉलेज बना संकटमोचक, मिला नया जीवन,
मेट्रो हॉस्पिटल के चंगुल से छूटने के बाद, परिजनों ने बिना वक्त गंवाए आशीष ठाकुर को नेताजी सुभाषचंद्र बोस मेडिकल कॉलेज में भर्ती कराया। मेडिकल कॉलेज के डॉक्टरों ने स्थिति की गंभीरता को देखते हुए तुरंत मोर्चा संभाला। बिना देरी किए इमरजेंसी ब्लड की व्यवस्था की गई और सही इलाज शुरू हुआ। मेडिकल कॉलेज के डॉक्टरों की इसी मुस्तैदी के कारण आज आशीष ठाकुर की जान बच सकी है और उनकी सेहत में सुधार है।
मेडिकल ऑडिट और लाइसेंस रद्द करने की उठ रही मांग,
अब इस पूरे मामले को लेकर पीड़ित समाजसेवी आशीष ठाकुर ने स्वास्थ्य विभाग और शासन-प्रशासन के खिलाफ मोर्चा खोल दिया है। उन्होंने मांग की है कि:
इस पूरे घटनाक्रम की उच्च स्तरीय मेडिकल ऑडिट कराई जाए।
अस्पताल के केस शीट, डॉक्टर-स्टाफ की ड्यूटी टाइमिंग और सीसीटीवी फुटेज जब्त किए जाएं।
मरीजों की जान से खेलने वाले लापरवाह डॉक्टरों के खिलाफ आपराधिक मुकदमा दर्ज हो।
आशीष ठाकुर का साफ कहना है कि उनके पास अस्पताल की इस घोर लापरवाही के पुख्ता मेडिकल दस्तावेज और सबूत मौजूद हैं। उन्होंने चेतावनी दी है कि यह लड़ाई सिर्फ उनकी नहीं, बल्कि उन हजारों मूक मरीजों की है जो इलाज के नाम पर इन निजी अस्पतालों की मनमानी और लापरवाही सहने को मजबूर हैं।



