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मरीज सरकारी, इलाज निजी क्यों? मेडिकल अस्पताल पर उठे गंभीर सवाल—रेफर मरीजों को कौन पहुंचा रहा बाहर?

मेडिकल से मरीजों को निजी अस्पताल भेजने का कथित खेल? रीवा से सिंगरौली तक के मरीजों पर कौन रखता है नजर!

जबलपुर। महाकौशल के सबसे बड़े सरकारी अस्पताल नेताजी सुभाष चंद्र बोस मेडिकल अस्पताल की व्यवस्था को लेकर गंभीर सवाल खड़े हो रहे हैं। रीवा, मैहर, कटनी, शहडोल, उमरिया, नरसिंहपुर, गोटेगांव, गाडरवारा, सिवनी, लखनादौन, छिंदवाड़ा, मंडला, डिंडोरी, शहपुरा और सिंगरौली सहित दूर-दराज के जिलों से गंभीर मरीज सरकारी इलाज की उम्मीद लेकर मेडिकल पहुंचते हैं। लेकिन सवाल यह है कि मेडिकल की चौखट पर पहुंचने के बाद कुछ मरीजों को निजी अस्पतालों की ओर क्यों भेजे जाने की शिकायतें सामने आ रही हैं?

सरकारी अस्पताल में इलाज नहीं तो फिर क्यों?
मरीज जब दूसरे जिलों से रेफर होकर मेडिकल पहुंचता है तो उसके परिवार को उम्मीद होती है कि यहां विशेषज्ञ डॉक्टर और बेहतर सुविधाएं मिलेंगी। ऐसे में यदि मरीज को निजी अस्पताल जाने की सलाह दी जाती है तो सबसे पहले यह स्पष्ट होना चाहिए कि मेडिकल में उसका इलाज क्यों संभव नहीं था? क्या वास्तव में सुविधा उपलब्ध नहीं थी या रेफरल के पीछे कोई दूसरी वजह थी?

मरीज की मजबूरी पर कौन उठा रहा फायदा?
गंभीर मरीज और उसके परिजन पहले ही मानसिक और आर्थिक संकट में होते हैं। ऐसे समय में यदि कोई व्यक्ति उन्हें बेहतर इलाज, आयुष्मान कार्ड या मुफ्त उपचार का भरोसा देकर निजी अस्पताल तक ले जाता है तो इसकी निष्पक्ष जांच जरूरी है। हर शिकायत में यह पता लगाया जाना चाहिए कि मरीज से संपर्क किसने किया और निजी अस्पताल तक पहुंचाने की प्रक्रिया कैसे शुरू हुई।

108 एंबुलेंस पर भी उठ रहे सवाल,

इस पूरे मामले में 108 एंबुलेंस और अन्य एंबुलेंस व्यवस्था की भूमिका की भी जांच जरूरी है। मरीज मेडिकल पहुंचा या सीधे किसी निजी अस्पताल ले जाया गया? एंबुलेंस किसके निर्देश पर बुलाई गई? चालक को किस अस्पताल ले जाने के लिए कहा गया? मरीज के परिजनों को क्या जानकारी दी गई? इन सवालों के जवाब एंबुलेंस लॉगबुक, कॉल रिकॉर्ड, सीसीटीवी और मरीजों के बयान से सामने आ सकते हैं।

डॉक्टरों से लेकर स्टाफ तक—जांच से कोई बाहर क्यों?
आरोपों में डॉक्टरों, वार्ड बॉय, सुरक्षा कर्मचारियों, निजी एंबुलेंस संचालकों और अन्य संबंधित लोगों की भूमिका पर सवाल उठ रहे हैं। इन आरोपों को सच मानना अभी उचित नहीं है, लेकिन यदि शिकायतें सामने आई हैं तो जांच में किसी भी स्तर को बाहर नहीं रखा जाना चाहिए। किस डॉक्टर ने मरीज देखा, क्या उपचार दिया, रेफरल क्यों किया और किस अस्पताल भेजने की सलाह दी—हर बिंदु की जांच होनी चाहिए।

डीन और अधीक्षक की जवाबदेही पर सवाल,
मेडिकल अस्पताल के डीन नवनीत सक्सेना और अधीक्षक अरविंद शर्मा से भी अब सीधे सवाल पूछे जाने चाहिए। अस्पताल परिसर में मरीजों से संपर्क करने वाले बाहरी लोगों की निगरानी कैसे होती है? निजी एंबुलेंस की आवाजाही पर क्या नियंत्रण है? रेफरल की मॉनिटरिंग कौन करता है? मरीजों को निजी अस्पताल भेजे जाने की शिकायतों पर अब तक कितनी जांच हुई?

आयुष्मान के नाम पर मरीजों को बाहर भेजा जा रहा है?
यदि मरीज को आयुष्मान योजना का लाभ मेडिकल में मिल सकता है, तो उसे निजी अस्पताल भेजने की जरूरत क्यों पड़ती है? और अगर निजी अस्पताल में आयुष्मान के तहत इलाज हुआ, तो उसका रिकॉर्ड कहां है? क्या मरीज या उसके परिवार से कोई अतिरिक्त राशि ली गई? इन सवालों का जवाब आयुष्मान पोर्टल रिकॉर्ड, उपचार फाइल, बिल और मरीज के बयान से मिल सकता है।

मेडिकल प्रशासन के सामने सबसे बड़ा सवाल,
मेडिकल अस्पताल केवल जबलपुर के मरीजों का अस्पताल नहीं है। पूरे महाकौशल और आसपास के जिलों के मरीज इस अस्पताल पर भरोसा करते हैं। ऐसे में यदि मरीजों को निजी अस्पतालों तक पहुंचाने का कोई संगठित तंत्र जांच में सामने आता है तो यह बेहद गंभीर मामला होगा। और यदि आरोप गलत हैं तो अस्पताल प्रशासन को दस्तावेजों के साथ स्थिति सार्वजनिक करनी चाहिए।

अब आश्वासन नहीं, जवाब चाहिए,
मामले की निष्पक्ष जांच में रेफरल रिकॉर्ड, CCTV फुटेज, 108 एंबुलेंस लॉगबुक, आयुष्मान रिकॉर्ड, मरीजों की उपचार फाइल, निजी अस्पतालों के बिल और संबंधित कर्मचारियों के बयान की जांच होनी चाहिए। जांच में यदि किसी डॉक्टर, कर्मचारी, एंबुलेंस चालक या अन्य व्यक्ति की लापरवाही या नियमों का उल्लंघन सामने आता है तो जिम्मेदारी तय होनी चाहिए।

सबसे बड़ा सवाल—मरीज मेडिकल में इलाज कराने आया था या निजी अस्पताल जाने के लिए?
अब सवाल सिर्फ एक मरीज का नहीं, बल्कि उन हजारों परिवारों का है जो रीवा से सिंगरौली और मंडला से छिंदवाड़ा तक मेडिकल अस्पताल को आखिरी उम्मीद मानकर पहुंचते हैं। क्या मेडिकल अस्पताल में मरीजों के इलाज की पर्याप्त व्यवस्था है? अगर है तो उन्हें निजी अस्पताल क्यों भेजा जाता है? और अगर नहीं है तो सरकारी मेडिकल कॉलेज की व्यवस्था पर कौन जवाब देगा?