यमदूतों को खुली छूट! जबलपुर में नो-एंट्री के नियमों का जनाजा किसने निकाला?चप्पे-चप्पे पर पुलिस, फिर भी शहर में घुसे यमदूत: क्या बिना ‘सेटिंग’ के मुमकिन है ये खेल?
यमदूतों को खुली छूट! जबलपुर में नो-एंट्री के नियमों का जनाजा किसने निकाला?चप्पे-चप्पे पर पुलिस, फिर भी शहर में घुसे यमदूत: क्या बिना 'सेटिंग' के मुमकिन है ये खेल?

संस्कारधानी के नाम से मशहूर जबलपुर शहर की, जहाँ की बदहाल यातायात व्यवस्था अब आम जनता की जान की दुश्मन बन चुकी है। शहर में नो-एंट्री के कड़े नियम होने के बावजूद, दिन के उजाले में बेखौफ दौड़ते डंपर और ओवरलोड वाहन पुलिस प्रशासन की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े कर रहे हैं। आखिर शहर के चारों तरफ बाईपास होने और चप्पे-चप्पे पर पुलिस पॉइंट होने के बाद भी ये भारी वाहन शहर के बीचों-बीच कैसे दाखिल हो रहे हैं? सड़कों पर मासूमों की मौत का असली जिम्मेदार कौन है,
नियम केवल कागजों पर, सड़कों पर बेलगाम रफ्तारजबलपुर शहर की सड़कों पर इस वक्त खौफ का मंजर है। नियम-कायदों को ताक पर रखकर रफ्तार भरते ये डंपर और ओवरलोड ट्रक किसी भी वक्त काल बन जाते हैं। शहर की सीमा में भारी वाहनों के प्रवेश के लिए समय तय है, जिसे नो-एंट्री कहा जाता है। लेकिन जबलपुर में यह नियम सिर्फ फाइलों और कागजों तक सीमित नजर आता है। वीआईपी रूट हो या आम बाजार, हर जगह ये बेलगाम डंपर काल बनकर दौड़ रहे हैं और इनके आगे पूरी व्यवस्था नतमस्तक दिखाई दे रही है।
चौराहों का खौफनाक नजारा, शहर के व्यस्त चौराहों से धूल उड़ाते और तेजी से निकलते ओवरलोड डंपर, पुलिस चेकिंग पॉइंट पर मुस्तैद दिखने का नाटक करते पुलिसकर्मी, नो-एंट्री के बोर्ड के ठीक नीचे से गुजरते भारी वाहन और सड़क हादसों के बाद जमा हुई,
बाईपास के बावजूद शहर के अंदर नो-एंट्री में कैसे घुसे वाहन?
हैरानी की बात यह है कि जबलपुर शहर के चारों तरफ करोड़ों की लागत से शानदार बाईपास सड़कें बनाई गई हैं। नियम के मुताबिक, सभी भारी वाहनों को शहर के बाहर-बाहर से ही गुजरना चाहिए। इसके अलावा, शहर के हर एंट्री पॉइंट पर यातायात पुलिस के चेकिंग पॉइंट और बैरिकेड्स मौजूद हैं। इसके बावजूद, ये यमदूत शहर के अंदर घुसने में कामयाब कैसे हो जाते हैं? क्या इन वाहन चालकों को कानून का कोई डर नहीं है, या फिर इन्हें खाकी और रसूखदारों का मूक संरक्षण प्राप्त है?
मालवीय चौक यातायात थाना क्षेत्र में घोर, लापरवाहीअब बात करते हैं शहर के सबसे व्यस्त और केंद्रीय इलाके की। यातायात थाना मालवीय चौक के अंतर्गत आने वाले मुख्य मार्ग और बाजार हमेशा आम जनता, महिलाओं और बच्चों से भरे रहते हैं। इस बेहद संवेदनशील और वीआईपी क्षेत्र में भी नो-एंट्री के दौरान भारी वाहनों का प्रवेश धड़ल्ले से हो रहा है। मालवीय चौक जैसे व्यस्ततम चौराहे के आसपास जब ये विशालकाय डंपर हॉर्न बजाते हुए निकलते हैं, तो राहगीरों की सांसें अटक जाती हैं। यहाँ मुस्तैद पुलिस बल आखिर इन वाहनों को देखकर भी आंखें क्यों मूंद लेता है?
गढ़ा यातायात थाना क्षेत्र की संकरी सड़कों पर मौत का सायादूसरी तरफ,
यातायात थाना गढ़ा क्षेत्र की स्थिति और भी बदतर है। मेडिकल कॉलेज रोड और गढ़ा के रिहायशी इलाकों की संकरी सड़कों पर दिन-रात भारी और ओवरलोड वाहनों का तांता लगा रहता है। इस क्षेत्र में कई स्कूल, कॉलेज और अस्पताल हैं, जिसके कारण यहाँ पैदल चलने वालों और दोपहिया वाहन चालकों की भारी भीड़ होती है। गढ़ा क्षेत्र में लगातार हो रही सड़क दुर्घटनाएं और मौतें गवाही दे रही हैं कि यहाँ यातायात प्रबंधन पूरी तरह से ध्वस्त हो चुका है और जिम्मेदार अधिकारी सिर्फ तमाशबीन बने हुए हैं।

घमापुर यातायात थाना क्षेत्र में नियमों की सरेआम धज्जियां,
शहर के एक और प्रमुख हिस्से यानी यातायात थाना घमापुर क्षेत्र पर नजर डालें, तो यहाँ अव्यवस्था चरम पर है। घमापुर और उसके आसपास के औद्योगिक व व्यापारिक रूटों पर ओवरलोडिंग एक आम बात बन चुकी है। क्षमता से दोगुना माल लादे ये ट्रक और डंपर संकरी गलियों और मुख्य मार्गों से बेखौफ गुजरते हैं। घमापुर क्षेत्र के रहवासियों का आरोप है कि पुलिस पॉइंट होने के बाद भी वाहनों की चेकिंग सिर्फ खानापूर्ति के लिए की जाती है, जबकि असल समस्या यानी नो-एंट्री में भारी वाहनों के प्रवेश पर कोई ठोस कार्रवाई नहीं होती।
जनता का फूटा गुस्सा और तीखे सवाल,
दिन के समय यहाँ से पैदल या बाइक से निकलना अपनी जान जोखिम में डालना है। बड़े-बड़े डंपर इतनी तेज रफ्तार में निकलते हैं कि संतुलन बिगड़ जाता है। पुलिस सामने खड़ी रहती है, चालान काटने में व्यस्त रहती है, लेकिन इन बड़े डंपरों को कोई नहीं रोकता। आए दिन यहाँ हमारे सामने हादसे हो रहे हैं और लोग मर रहे हैं। इसका जवाब कौन देगा?
भ्रष्टाचार का गठजोड़ और मौतों का असली जिम्मेदार कौन?
सड़कों पर हो रही इन असमय मौतों का जिम्मेदार आखिर कौन है? क्या वह यातायात पुलिस है जो केवल छोटे दोपहिया वाहनों का चालान काटने में व्यस्त है? या वह परिवहन विभाग (RTO) है जो ओवरलोडिंग और बिना फिटनेस वाले वाहनों पर आंखें मूंदे बैठा है? जब भी कोई बड़ा हादसा होता है, तो पुलिस प्रशासन कुछ दिनों के लिए दिखावे की सख्ती करता है, लेकिन जैसे ही मामला शांत होता है, नो-एंट्री में भारी वाहनों की ‘एंट्री’ का यह खूनी खेल फिर शुरू हो जाता है। साफ है कि चंद रुपयों के लालच और भ्रष्टाचार के गठजोड़ के कारण आम जनता को अपनी जान देकर इसकी कीमत चुकानी पड़ रही है।
अब कागजी कार्रवाई नहीं, धरातल पर सख्त ऐक्शन की जरूरतयह स्थिति बेहद चिंताजनक और डराने वाली है। जबलपुर की जनता अब खोखले आश्वासनों और कागजी नियमों से थक चुकी है। संस्कारधानी के नागरिकों को सड़कों पर सुरक्षित चलने का अधिकार चाहिए। अगर समय रहते मालवीय चौक, गढ़ा और घमापुर समेत पूरे शहर के नो-एंट्री पॉइंट पर सख्त और ईमानदार कार्रवाई नहीं की गई, तो न जाने और कितनी मासूम जानें इन सड़कों पर दम तोड़ देंगी। प्रशासन को अब अपनी गहरी नींद से जागना होगा और इस लापरवाही के जिम्मेदार अधिकारियों पर कड़ी कार्रवाई करनी होगी।



