लाल पट्टी वालों को खुली छूट या आबकारी-पुलिस की नाकामी? शराब पकड़ने निकले संगठन पर बड़ा सवाल, आखिर संरक्षण किसका?
मेडिकल गेट के पास दो पेटी शराब मिलने के बाद गरमाया मामला, सवालों के घेरे में आबकारी विभाग और पुलिस की निगरानी व्यवस्था

जबलपुर। शहर में अवैध शराब के कारोबार पर लगाम लगाने की जिम्मेदारी पुलिस और आबकारी विभाग की है, लेकिन मेडिकल गेट के पास सामने आया घटनाक्रम अब पूरी व्यवस्था पर सवाल खड़े कर रहा है। भगवती मानव कल्याण संगठन के कार्यकर्ताओं द्वारा शराब ले जा रहे एक युवक को रोकने और उसका पीछा करने का दावा किया गया है। युवक कथित तौर पर दो पेटी शराब सड़क पर छोड़कर फरार हो गया। बाद में संगठन के कार्यकर्ताओं ने गड़ा थाना पुलिस को सूचना दी, जिसके बाद पुलिस मौके पर पहुंची और शराब को कब्जे में लिया।
शराब पकड़ने सड़क पर कौन उतरा?
सबसे बड़ा सवाल यह है कि आखिर किसी निजी संगठन के कार्यकर्ता शराब पकड़ने के लिए सड़कों पर क्यों उतर रहे हैं? यदि संगठन को अवैध शराब की सूचना मिली थी तो पुलिस या आबकारी विभाग को सूचना देना पर्याप्त था। लेकिन यहां कार्यकर्ताओं द्वारा संदिग्ध युवक का पीछा करने और उसे रोकने का दावा सामने आया है। अगर आम लोग भी इसी तरह संदिग्धों का पीछा करने लगें तो कानून-व्यवस्था की जिम्मेदारी किसकी रहेगी? प्रशासन को यह स्पष्ट करना चाहिए कि इन कार्यकर्ताओं को किसी प्रकार का आधिकारिक अधिकार या अनुमति प्राप्त है या नहीं।
‘लाल पट्टी’ वालों को खुला संरक्षण किसका?
इस पूरे मामले में अब एक और सवाल चर्चा में है—आखिर लाल पट्टी लगाकर घूमने और संदिग्ध लोगों को रोकने वालों को इतना खुला मैदान किसने दिया? यदि उनके पास कोई वैधानिक अधिकार नहीं है तो पुलिस और प्रशासन को उनकी भूमिका स्पष्ट करनी चाहिए। किसी संगठन का नशे के खिलाफ अभियान चलाना अलग बात है, लेकिन कानून लागू करने की भूमिका निभाना अलग विषय है। प्रशासन को यह भी देखना होगा कि कहीं सामाजिक अभियान की आड़ में कोई व्यक्ति कानून अपने हाथ में तो नहीं ले रहा।
कुंभकरण की नींद में आबकारी विभाग?
अवैध शराब की बिक्री और परिवहन पर कार्रवाई के लिए आबकारी विभाग की जिम्मेदारी भी तय है। ऐसे में सवाल उठता है कि धनवंतरी नगर क्षेत्र में शराब के परिवहन की जानकारी पुलिस या आबकारी विभाग से पहले संगठन के कार्यकर्ताओं तक कैसे पहुंची? यदि अवैध शराब का कारोबार चल रहा है तो विभाग की निगरानी व्यवस्था कितनी प्रभावी है? क्या नियमित गश्त और जांच हो रही है? क्या शराब के स्रोत और सप्लाई चैन तक विभाग पहुंच पा रहा है? जनता को इन सवालों का जवाब मिलना चाहिए।
या फिर पुलिस भी सो रही है?
दूसरी तरफ गढ़ा थाना पुलिस की सक्रियता पर भी सवाल उठाना जरूरी है। यदि शराब का परिवहन खुले तौर पर हो रहा था और किसी संगठन के कार्यकर्ता उसका पीछा कर रहे थे, तो पुलिस की पेट्रोलिंग व्यवस्था कहां थी? क्या पुलिस को इस गतिविधि की जानकारी नहीं थी? क्या क्षेत्र में अवैध शराब की निगरानी के लिए पर्याप्त व्यवस्था है? पुलिस ने मौके पर पहुंचकर शराब तो बरामद कर ली, लेकिन अब असली चुनौती उस व्यक्ति तक पहुंचने की है जो शराब लेकर जा रहा था और यह पता लगाने की है कि शराब आखिर कहां से आई थी।
दो पेटी शराब बरामद, असली सप्लायर कौन?
मामले में सबसे महत्वपूर्ण सवाल सिर्फ दो पेटी शराब मिलने का नहीं है। असली सवाल यह है कि शराब की सप्लाई किसने की, कहां से निकली और इसे किसके पास पहुंचाया जाना था? यदि पुलिस जांच में अवैध परिवहन की पुष्टि होती है तो केवल मौके से शराब छोड़कर भागे युवक की तलाश पर्याप्त नहीं होगी। पुलिस और आबकारी विभाग को शराब के पूरे नेटवर्क तक पहुंचना चाहिए। तभी यह पता चल सकेगा कि क्षेत्र में अवैध शराब का कारोबार किस स्तर पर चल रहा है।
हाथों में डंडे लेकर कार्रवाई—जवाबदेही कौन लेगा?
यदि संगठन के कार्यकर्ता हाथों में डंडे लेकर संदिग्ध लोगों को रोकते हैं तो यह भी प्रशासन के लिए चिंता का विषय होना चाहिए। कल को किसी संदिग्ध व्यक्ति और संगठन के कार्यकर्ताओं के बीच विवाद बढ़ जाता है, मारपीट हो जाती है या कोई गंभीर घटना घट जाती है तो उसकी जिम्मेदारी कौन लेगा? कानून व्यवस्था बनाए रखने का काम अधिकृत पुलिस एजेंसियों का है। इसलिए प्रशासन को यह तय करना होगा कि सामाजिक संगठनों की भूमिका सूचना देने और जागरूकता फैलाने तक रहे, या उन्हें सड़क पर संदिग्धों को रोकने की अनुमति भी है।
पुलिस से पहले संगठन क्यों पहुंच रहा?
यह सवाल भी कम गंभीर नहीं है कि अगर क्षेत्र में अवैध शराब का परिवहन हो रहा है तो पुलिस की सूचना व्यवस्था और मुखबिर तंत्र कितना सक्रिय है? पुलिस को अपराध की सूचना अपने नेटवर्क से मिलनी चाहिए। यदि बार-बार निजी संगठन पुलिस से पहले संदिग्धों तक पहुंच रहे हैं तो यह पुलिस की निगरानी व्यवस्था की समीक्षा का विषय बन सकता है। हालांकि इसका कारण क्या है, यह जांच के बाद ही स्पष्ट होगा।
आबकारी विभाग की जिम्मेदारी तय हो,
अवैध शराब के मामले में पुलिस के साथ-साथ आबकारी विभाग की भूमिका भी महत्वपूर्ण है। इसलिए विभाग को सामने आकर बताना चाहिए कि धनवंतरी नगर और आसपास के इलाकों में अवैध शराब के खिलाफ कितनी कार्रवाई हुई है। कितने प्रकरण दर्ज किए गए हैं? कितने वाहन पकड़े गए? शराब के अवैध परिवहन की शिकायतों पर क्या कार्रवाई हुई? यदि कोई नेटवर्क सक्रिय है तो उसके खिलाफ क्या रणनीति बनाई गई है? इन सवालों का जवाब जनता जानना चाहती है।
क्या कार्रवाई सिर्फ शराब मिलने तक सीमित रहेगी?
मौके से शराब बरामद होना कार्रवाई की शुरुआत है, अंत नहीं। पुलिस को फरार युवक की पहचान कर उसे गिरफ्तार करना चाहिए और उससे पूछताछ कर शराब के स्रोत का पता लगाना चाहिए। यदि जांच में कोई बड़ा सप्लाई नेटवर्क सामने आता है तो उसके खिलाफ भी वैधानिक कार्रवाई होनी चाहिए। साथ ही शराब की बिक्री और परिवहन में किसी अन्य व्यक्ति की भूमिका सामने आती है तो उसकी भी जांच आवश्यक है।
लाल पट्टी वालों की भूमिका भी जांचे प्रशासन,
प्रशासन को संगठन के कार्यकर्ताओं की भूमिका पर भी स्पष्टता देनी चाहिए। यदि उन्होंने पुलिस को सूचना देकर सहयोग किया है तो यह अलग बात है, लेकिन यदि उन्होंने स्वयं कानून लागू करने जैसी कार्रवाई की है तो यह अलग विषय है। किसी को भी कानून अपने हाथ में लेने की अनुमति नहीं होनी चाहिए। प्रशासन को यह भी सुनिश्चित करना होगा कि भविष्य में कोई अप्रिय स्थिति न बने और नागरिक तथा पुलिस दोनों की सुरक्षा बनी रहे।
अब सवाल सीधे जिम्मेदार विभागों से,
शहर में अवैध शराब का कारोबार रोकना है तो पुलिस और आबकारी विभाग को जमीन पर सक्रिय होना होगा। सिर्फ सूचना मिलने के बाद कार्रवाई करने से काम नहीं चलेगा। लगातार निगरानी, संदिग्ध गतिविधियों पर नजर और शराब के स्रोत तक पहुंचना जरूरी है। दूसरी तरफ सामाजिक संगठनों को भी कानून के दायरे में रहकर पुलिस को सूचना देनी चाहिए।
अब सबसे बड़ा सवाल यही है—आखिर शराब पकड़ने का काम पुलिस और आबकारी विभाग से पहले ‘लाल पट्टी वालों’ के हाथ में क्यों दिखाई दे रहा है? क्या आबकारी विभाग की निगरानी कमजोर है, क्या पुलिस की पेट्रोलिंग में कमी है, या फिर दोनों विभागों की व्यवस्था को और मजबूत करने की जरूरत है?
जवाबदेही तय हुई तो ही रुकेगा अवैध कारोबार,
मेडिकल गेट के पास दो पेटी शराब मिलने की घटना को केवल एक सामान्य कार्रवाई मानकर छोड़ देना आसान होगा, लेकिन इससे जुड़े सवाल बेहद गंभीर हैं। अवैध शराब के खिलाफ कार्रवाई भी जरूरी है और कानून व्यवस्था की मर्यादा बनाए रखना भी। पुलिस को शराब के स्रोत तक पहुंचना होगा, आबकारी विभाग को अपनी निगरानी व्यवस्था स्पष्ट करनी होगी और प्रशासन को यह बताना होगा कि निजी संगठन के कार्यकर्ताओं की भूमिका की सीमा क्या है।
अब जनता की नजर इस बात पर है कि गड़ा थाना पुलिस जांच को किस दिशा में आगे बढ़ाती है, फरार युवक तक कब पहुंचती है और शराब के असली स्रोत का खुलासा कब होता है। साथ ही यह भी देखना होगा कि आबकारी विभाग इस मामले को गंभीरता से लेकर क्षेत्र में अवैध शराब के खिलाफ क्या ठोस कार्रवाई करता है।
क्योंकि सवाल सिर्फ दो पेटी शराब का नहीं है—सवाल यह है कि जब कानून लागू करने वाली एजेंसियां मौजूद हैं, तो आखिर सड़क पर शराब पकड़ने की भूमिका निजी संगठनों तक क्यों पहुंच रही है?



