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जबलपुर: मेडिकल गेट से शुरू होता है मौत का खेल!” सरकारी एंबुलेंस के मरीज पहुंच रहे प्राइवेट अस्पताल—दलालों का संगठित नेटवर्क बेनकाब

मेडिकल गेट से शुरू होता है मौत का खेल!” सरकारी एंबुलेंस के मरीज पहुंच रहे प्राइवेट अस्पताल—दलालों का संगठित नेटवर्क बेनकाब

जबलपुर का नेताजी सुभाष चंद्र बोस मेडिकल अस्पताल एक बार फिर गंभीर आरोपों के घेरे में है। सड़क हादसों में घायल मरीजों को बचाने के लिए जहां सरकारी एंबुलेंस दिन-रात दौड़ रही है, वहीं अस्पताल के बाहर सक्रिय दलालों का नेटवर्क इस पूरी व्यवस्था को कमजोर कर रहा है।

बताया जा रहा है कि सड़क दुर्घटना में घायल मरीजों को पहले सरकारी एंबुलेंस के माध्यम से मेडिकल अस्पताल लाया जाता है, लेकिन जैसे ही एंबुलेंस अस्पताल के गेट पर पहुंचती है, वहां पहले से खड़े दलाल सक्रिय हो जाते हैं। ये दलाल परिजनों को घेर लेते हैं और उन्हें सरकारी अस्पताल की व्यवस्थाओं को लेकर गुमराह करते हैं।

हैरानी की बात यह है कि कई मामलों में मरीज को स्ट्रेचर से उतारने से पहले ही उसके परिजनों को प्राइवेट अस्पताल ले जाने के लिए राजी कर लिया जाता है। यह पूरा खेल कमीशन और सेटिंग पर आधारित बताया जा रहा है, जिसमें प्राइवेट एंबुलेंस संचालक भी शामिल हैं।

हाल ही में लहेम्टा घाट बाईपास के पास हुए सड़क हादसे में घायल युवक मनीष यादव (27 वर्ष) के साथ भी कुछ ऐसा ही हुआ। उसे घटनास्थल से सीधे मेडिकल अस्पताल लाया गया था, लेकिन आरोप है कि मेडिकल के बाहर मौजूद दलालों ने उसे वहां से हटाकर प्राइवेट अस्पताल पहुंचा दिया।

बताया जा रहा है कि प्राइवेट अस्पताल में इलाज के दौरान युवक की हालत बिगड़ती गई और अंततः उसकी मौत हो गई। दुखद बात यह है कि मौत के बाद उसे दोबारा मेडिकल अस्पताल लाया गया, जहां डॉक्टरों ने उसे मृत घोषित कर दिया।

यह घटना साफ संकेत देती है कि मेडिकल अस्पताल के बाहर दलालों का नेटवर्क किस तरह सक्रिय है।
सरकारी एंबुलेंस मरीज को बचाने लाती है, लेकिन गेट पर खड़े दलाल उसे “कमाई का जरिया” बना देते हैं।

स्थानीय लोगों का कहना है कि यह कोई एक दिन की बात नहीं है। मेडिकल अस्पताल के मुख्य गेट के बाहर रोजाना ऐसे दलाल खड़े दिखाई देते हैं, जो निजी अस्पतालों से सीधे जुड़े हुए हैं। जैसे ही कोई गंभीर मरीज आता है, उसे तुरंत अपने जाल में फंसाने की कोशिश शुरू हो जाती है।

सबसे बड़ा सवाल यह है कि
क्या अस्पताल प्रबंधन को इस सबकी जानकारी नहीं है, क्या स्वास्थ्य विभाग इस खुलेआम चल रहे खेल पर आंखें बंद किए बैठा है?

अगर समय रहते इस पर सख्ती नहीं की गई, तो यह दलाली सिस्टम” और मजबूत होता जाएगा और सड़क हादसों में घायल मरीजों की जान यूं ही जोखिम में पड़ती रहेगी।

अब जरूरत है सख्त कार्रवाई की,
मेडिकल अस्पताल के बाहर दलालों पर तत्काल रोक लगे, प्राइवेट एंबुलेंस संचालकों की जांच हो
दोषियों के खिलाफ कड़ी कानूनी कार्रवाई हो

यह सिर्फ एक खबर नहीं, बल्कि उस सच्चाई का आईना है जहां इलाज से पहले सौदा तय हो रहा है और इंसान की जिंदगी से ज्यादा कीमत कमीशन की हो गई है।

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