होलकर परिवार का होली उत्सव:गुलाबजल से धुलता था राजबाड़ा, देते थे तोप व गोलियों से सलामी;15 साल बाद ‘युवराज’ भी हो सकते हैं शामिल

 होलकर परिवार का होली उत्सव:गुलाबजल से धुलता था राजबाड़ा, देते थे तोप व गोलियों से सलामी;15 साल बाद ‘युवराज’ भी हो सकते हैं शामिल
SET News:

मध्य प्रदेश का दिल कहे जाने वाले राजबाडा पर इस साल फिर धूमधाम से होली मनाई जाएगी। यहां पर सरकारी होलिका दहन की परंपरा सैकड़ों साल पुरानी है। राजा-महाराजाओं के समय से यह परंपरा चली आ रही है। जिसका निर्वहन आज भी हो रहा है। हालांकि उस वक्त के होलिका दहन के स्वरूप और अब के स्वरूप में थोड़ा अंतर जरूर आया है, मगर मध्य प्रदेश की यह परंपरा आज भी कायम है। चलिए आपको आज इस परंपरा से रूबरू कराते हैं और बताते हैं कि कैसे हुई थी इसकी शुरुआत। इस बार कैसा होगा होलिका दहन और राजपरिवार से कौन हो सकता है इसमें शामिल।

1728 से शुरुआत, बग्घी में सवार होकर आते थे शासक

खासगी ट्रस्ट मार्तण्ड देवस्थान के पुजारी पं. लीलाधर वारकर के मुताबिक, होलकर राज के संस्थापक सूबेदार मल्हारराव होलकर ने सन् 1728 में राजबाडा चौक पर होलिका दहन की शुरूआत की थी। उस वक्त होलिका दहन से पहले राजबाडा चौक को गुलाबजल से धोया जाता था। होलिका दहन के साथ ही पांच दिनी होली उत्सव की शुरू हो जाता था। होलिका दहन की तैयारी एक माह पूर्व यानी दांडी पूर्णिमा से होती थी। दहन के लिए होलकर शासक चार घोड़ों की बग्घी पर सवार होकर आते थे। होली दहन के पहले और बाद में होलकर कैवेलरी का 20 घुड़सवारों का दस्ता 21-21 राउंड फायर करता था। साथ ही पांच तोपों की सलामी भी दोनों बार दी जाती थी। होलकर सेना सलामी और गॉर्ड ऑफ ऑनर देती थी। बाद में ब्रिटिश इंपिरियल आर्मी ने भी इस परंपरा को जारी रखा। परंपरा के मुताबिक होली प्रज्वलित करने के लिए अग्नि, सायरा नाका पिंजरा बाखल से लाई जाती। बली के रूप में भूरा कद्दू (कोला) काटा जाता था। जरी पटके वाले पंचभईया होलकर की नियुक्ति भी की जाती थी।

15 साल बाद युवराज के आने की संभावना
पं. वारकर ने बताया इस बार होलिका दहन पर होलकर राजवंश के युवराज श्रीमंत यशवंत राव होलकर तृतीय भी आ सकते हैं। ऐसी संभावना जताई जा रही है कि वे इस बार होलिका दहन मध्य प्रदेश में ही करेंगे और इस आयोजन में शामिल होंगे। अगर वे आते हैं तो 15 साल बाद ऐसा होगा जब इस आयोजन में होलकर राजवंश के युवराज शामिल होंगे। उसके साथ ही मध्य प्रदेश में वर्तमान में पंचभईया होलकर भी शामिल हो सकते हैं। साथ ही समाज के कई लोग भी इसमें आएंगे।

शाम 7 बजे 1100 कंडों से होगा होलिका दहन
पं. वारकर बताते हैं कि परंपरा के मुताबिक सरकारी होलिका दहन शाम 7 बजे किया जाता है। 1100 कंडों से होलिका दहन किया जाएगा। कंडों से होलिका दहन की परंपरा 6 साल पहले ही शुरू हुई है। इससे पहले तक ढाई सौ किलो लकड़ी से इसे किया जाता था। 1100 कंडों के साथ ही दहन में 25 से 30 घास की पिंडी और 250 ग्राम कपूर लगता है।

होलिका को अर्पित किए जाते हैं नए वस्त्र
वारकर ने बताया होलिका दहन के लिए शाम 6 बजे से तैयारी शुरू कर दी जाती है। होलिका दहन से पहले पंचामृत जिसमें दूध, दही, घी, शहद, शक्कर से अभिषेक किया जाता है। गणेश पूजन कर होली का आह्वान किया जाता है। होलिका को नए वस्त्र अर्पित किए जाते हैं। शक्कर और नारियल की माला पहनाई जाती है। पूरन पोली, दाल-चावल, भजिए, कुरडाई, चटनी, सलाद आदि का महानैवेद्य लगाया जाता है। होलिका की आरती कर ठीक 7 बजे होलिका का दहन किया जाता है।

दहन के बाद भगवान और अहिल्या बाई की गादी को लगाते हैं गुलाल
होलिका दहन के बाद समाजजन राजबाड़ा स्थित मल्हारी मार्तण्ड मंदिर में भगवान का पूजन करने जाते हैं। पूजन के बाद मंदिर के पुजारी कुल देवता मल्हारी मार्तण्ड और देवी अहिल्या बाई होलकर की गादी को रंग-गुलाल लगाते हैं। इसके बाद वहां मौजूद समाजजनों को रंग-गुलाल लगाकर होली खेली जाती है।

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