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झूठी और भ्रामक रिपोर्टिंग पर सख्त रुख: वरिष्ठ अधिवक्ता विवेक तंखा ने मीडिया संस्थान को भेजा कानूनी नोटिस

रिपोर्ट में भूमिका को गलत तरीके से पेश करने का आरोप, 48 घंटे में सामग्री हटाने, माफ़ी और स्पष्टीकरण की मांग

सेटन्यूज़, नई दिल्ली/ जबलपुर। राज्यसभा सांसद एवं सुप्रीम कोर्ट के वरिष्ठ अधिवक्ता Vivek Tankha ने अपने बारे में प्रकाशित कथित झूठी, भ्रामक और मानहानिकारक रिपोर्टिंग को लेकर एक प्रमुख मीडिया संस्थान और उससे जुड़े डिजिटल प्लेटफ़ॉर्म के विरुद्ध कानूनी नोटिस जारी किया है। नोटिस में आरोप लगाया गया है कि प्रकाशित समाचार और उससे जुड़े सोशल मीडिया पोस्ट ने तथ्यों को गलत ढंग से प्रस्तुत कर उनकी सार्वजनिक छवि को नुकसान पहुंचाया है।

विवेक तंखा की ओर से उनके अधिवक्ता के माध्यम से भेजे गए नोटिस में कहा गया है कि संबंधित रिपोर्ट में यह संकेत दिया गया कि उन्होंने सामाजिक कार्यकर्ता सोनम वांगचुक और केंद्र सरकार के बीच मध्यस्थ की भूमिका निभाई तथा अनशन समाप्त कराने में निर्णायक भूमिका निभाई। नोटिस के अनुसार यह दावा तथ्यात्मक रूप से गलत, भ्रामक और मानहानिकारक है।

नोटिस में मीडिया संस्थान से मांग की गई है कि वह संबंधित समाचार, डिजिटल सामग्री तथा सोशल मीडिया पोस्ट को तत्काल हटाए, भ्रामक शीर्षकों में सुधार करे और 48 घंटे के भीतर बिना शर्त सार्वजनिक माफ़ी तथा स्पष्टिकरण जारी करे। साथ ही चेतावनी दी गई है कि यदि निर्धारित समय सीमा के भीतर ऐसा नहीं किया गया तो संबंधित पक्ष के विरुद्ध उपयुक्त दीवानी और आपराधिक कानूनी कार्रवाई की जाएगी।

नोटिस के अनुसार विवेक तंखा ने स्पष्ट किया है कि उन्होंने सोनम वांगचुक से मुलाकात केवल मानवीय आधार पर उनके स्वास्थ्य को लेकर चिंता व्यक्त करने के लिए की थी। उनका कहना है कि उन्होंने कभी भी केंद्र सरकार, गृह मंत्रालय या किसी सरकारी एजेंसी की ओर से कोई मध्यस्थता नहीं की और न ही उन्हें इस संबंध में कोई अधिकृत जिम्मेदारी सौंपी गई थी।

विवेक तंखा का पक्ष है कि संबंधित रिपोर्ट और उसके प्रचार-प्रसार में प्रयुक्त शीर्षकों तथा सोशल मीडिया पोस्टों ने ऐसा आभास उत्पन्न किया मानो उन्होंने आंदोलन समाप्त कराने के लिए सरकार की ओर से सक्रिय भूमिका निभाई हो, जबकि उनका कहना है कि यह निष्कर्ष वास्तविक तथ्यों से मेल नहीं खाता।

उल्लेखनीय है कि जिस रिपोर्ट पर आपत्ति जताई गई, उसमें सोनम वांगचुक के अनशन समाप्त होने की पृष्ठभूमि में विवेक तंखा की भूमिका का उल्लेख किया गया था। बाद में प्रकाशित सामग्री के शीर्षक में भी परिवर्तन किया गया, लेकिन तंखा का कहना है कि इससे मूल रूप से उत्पन्न हुई भ्रामक धारणा समाप्त नहीं हुई।

मीडिया कानून के जानकारों का मानना है कि यदि किसी समाचार या डिजिटल सामग्री से किसी व्यक्ति की प्रतिष्ठा प्रभावित होने का आरोप लगाया जाता है तो भारतीय कानून के तहत संबंधित व्यक्ति को मानहानि का दावा करने और सुधार या खंडन की मांग करने का अधिकार प्राप्त है। ऐसे मामलों में अदालत प्रकाशित सामग्री, उसके संदर्भ, प्रयुक्त भाषा और उपलब्ध साक्ष्यों के आधार पर तथ्यों की जांच करती है।

फिलहाल संबंधित मीडिया संस्थान की ओर से इस कानूनी नोटिस पर सार्वजनिक रूप से क्या जवाब दिया जाएगा, इस पर सभी की नजरें टिकी हैं। यदि निर्धारित समय सीमा के भीतर विवाद का समाधान नहीं होता, तो मामला न्यायालय तक पहुंच सकता है। इस घटनाक्रम ने एक बार फिर मीडिया रिपोर्टिंग में तथ्यात्मक शुद्धता, संपादकीय जवाबदेही और मानहानि संबंधी कानूनी दायित्वों पर व्यापक चर्चा छेड़ दी है।

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