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जबलपुर: भारत माता प्रोजेक्ट’ का पुल बारिश से पहले ही जमींदोज, मंत्री पर उठे सवाल,चार बार के सांसद, अब PWD मंत्री, फिर भी अपने जिले में विकास की यह हालत, तो पूरे प्रदेश का क्या हाल होगा?

SET NEWS, जबलपुर। प्रदेश की शिवराज और फिर वर्तमान में काबिज मोहन सरकार में विकास को लेकर चाहे जितने दावे किए गए हों, लेकिन जमीनी हकीकत एक बार फिर उजागर हो गई है। जबलपुर जिले के बरेला क्षेत्र में नहर पर निर्माणाधीन पुल, जो ‘भारत माता प्रोजेक्ट’ के अंतर्गत बनाया जा रहा है, बारिश शुरू होने से पहले ही धंस गया। यह हादसा महज एक निर्माण दुर्घटना नहीं, बल्कि सरकारी तंत्र की लापरवाही और भ्रष्ट निर्माण कार्यों का जीता-जागता प्रमाण है। करीब 60 फीट लंबे इस पुल का आधा स्लैब पहले ही डाला जा चुका था, जबकि शेष हिस्से पर शुक्रवार को स्लैब डाले जाते समय अचानक पुल का हिस्सा ढह गया। गनीमत रही कि कोई जानमाल की क्षति नहीं हुई, लेकिन सवाल निर्माण की गुणवत्ता और जिम्मेदारी तय करने को लेकर अब और तीखे हो रहे हैं।

PWD मंत्री के अपने जिले में ही ढह गया भरोसा-
इस पूरे मामले में सबसे चौंकाने वाली बात यह है कि प्रदेश के लोक निर्माण मंत्री राकेश सिंह, जो खुद चार बार के सांसद रह चुके हैं और अब विधायक एवं कैबिनेट मंत्री हैं, वही इस जिले के जनप्रतिनिधि हैं जहां यह हादसा हुआ है। राकेश सिंह ने कुछ दिन पूर्व सड़कों को लेकर दिए अपने विवादास्पद बयान से राष्ट्रीय स्तर तक विवाद खड़ा कर दिया था। अब अपने ही जिले में सड़कों और पुलों की यह दुर्दशा उनके नेतृत्व और पीडब्ल्यूडी की कार्यशैली पर बड़ा प्रश्नचिह्न खड़ा करती है।

विज्ञप्तियों से नहीं, कार्रवाई से होगा विश्वास कायम-
प्रदेश में ऐसे प्रोजेक्ट्स राष्ट्रीय स्तर पर करोड़ों की लागत से तैयार किए जाते हैं, लेकिन उनका इस तरह समय से पहले ध्वस्त हो जाना न केवल जनता के पैसों की बर्बादी है, बल्कि जन-विश्वास का अपमान भी है। अफसोस की बात यह है कि मंत्री महोदय भले ही छोटे-छोटे कार्यक्रमों की प्रेस विज्ञप्तियाँ अपने छुटभैया से जारी करवा कर अपना प्रचार प्रसार करवा लेते हैं। लेकिन अपने ही जिले में हुई इस गंभीर चूक पर अब तक खेद तक व्यक्त नहीं किया है, ना ही किसी जिम्मेदार अधिकारी या ठेकेदार पर कार्रवाई की घोषणा की गई है।
पारदर्शिता, निगरानी के साथ निभाना होगी जिम्मेदारी-
अगर PWD मंत्री के जिले में निर्माण कार्यों की यह हालत है, तो कल्पना कीजिए उन जिलों में क्या हाल होगा जहां उनके निरीक्षण की संभावना तक नहीं होती। अब सवाल सिर्फ पुल धंसने का नहीं है, सवाल है सरकारी कामकाज की पारदर्शिता, निगरानी व्यवस्था और मंत्री की जिम्मेदारी का।

जनता जानना चाहती है–

किस ठेकेदार को यह काम सौंपा गया?

निर्माण की निगरानी में कौन अधिकारी थे?

क्या निर्माण से पहले किसी तकनीकी मूल्यांकन की रिपोर्ट थी?

दोषियों पर कब तक होगी सख्त कार्रवाई?

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