एक करोड़ 63 लाख की गड़बड़ी से महाकौशल का सबसे बड़ा अस्पताल कठघरे में! चौथा आरोपी गिरफ्तार, फरार महिला की तलाश—2020 से 2025 तक कौन सोता रहा?
एक करोड़ 63 लाख की गड़बड़ी से महाकौशल का सबसे बड़ा अस्पताल कठघरे में! चौथा आरोपी गिरफ्तार, फरार महिला की तलाश—2020 से 2025 तक कौन सोता रहा?

जबलपुर। महाकौशल के सबसे बड़े सरकारी चिकित्सा संस्थानों में शामिल नेताजी सुभाषचंद्र बोस चिकित्सा महाविद्यालय एवं अस्पताल की कैश शाखा में सामने आई करीब ₹1 करोड़ 63 लाख 78 हजार 456 रुपये की कथित वित्तीय गड़बड़ी ने पूरे प्रशासनिक तंत्र को सवालों के घेरे में ला दिया है। मामला अब केवल पांच कर्मचारियों के खिलाफ दर्ज FIR तक सीमित नहीं दिख रहा, बल्कि जांच का दायरा बढ़ने के साथ यह सवाल भी उठ रहा है कि 2020 से 2025 तक अस्पताल की वित्तीय व्यवस्था की निगरानी करने वाले अधिकारी आखिर क्या कर रहे थे?
चौथा आरोपी गिरफ्तार, फरार महिला की तलाश
मामले में मनोहर केवट, साधना चंद्रौल, भानू सिंह शाक्यवार, अरविन्द धुर्वे और विशाल सराठे के नाम आरोपी के तौर पर सामने आए हैं। पुलिस कार्रवाई में चौथे आरोपी की गिरफ्तारी की जा चुकी है, जबकि फरार महिला आरोपी साधना चंद्रौल की तलाश गढ़ा थाना पुलिस द्वारा की जा रही है।
पुलिस ने मामले में उपलब्ध रिकॉर्ड के आधार पर संबंधित धाराओं में प्रकरण दर्ज कर जांच शुरू की है। आरोपियों की वास्तविक भूमिका और दोष जांच तथा न्यायालयीन प्रक्रिया के बाद ही तय होगी।
2020 से 2025 तक का हिसाब, अब बना सबसे बड़ा सवाल
मामले की शुरुआत मेडिकल कॉलेज के अधिष्ठाता डॉ. नवनीत सक्सेना की शिकायत से हुई। शिकायत के अनुसार कैश शाखा में छात्र फीस, OPD, IPD और अन्य मदों से प्राप्त राशि MRB यानी मनी रसीद बुक के माध्यम से दर्ज की जाती थी और फिर उसे संबंधित बैंक खातों में जमा किया जाना था।
रिकॉर्ड और बैंक में जमा रकम के मिलान में कथित तौर पर करीब ₹1.63 करोड़ का अंतर सामने आया। अब सवाल यह है कि यदि यह अंतर वर्षों से रिकॉर्ड में मौजूद था, तो इतने बड़े सरकारी अस्पताल के जिम्मेदार कर्मचारी और अधिकारी इसे समय रहते क्यों नहीं पकड़ पाए?
क्या नियमित कैश मिलान होता था? क्या बैंक स्टेटमेंट की जांच की जाती थी? क्या MRB का सत्यापन होता था? क्या वरिष्ठ अधिकारियों को रिपोर्ट भेजी जाती थी?
क्या अस्पताल प्रशासन कुंभकरण की नींद में था?
यह सवाल अब इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि मामला किसी एक दिन की छोटी रकम का नहीं, बल्कि अप्रैल 2020 से नवंबर 2025 तक के रिकॉर्ड से जुड़ा बताया जा रहा है।
अगर जांच में सामने आया कथित अंतर सही साबित होता है तो यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि इतने लंबे समय तक वित्तीय निगरानी की जिम्मेदारी संभालने वाले अधिकारी क्या कर रहे थे।
नेताजी सुभाषचंद्र बोस चिकित्सा महाविद्यालय एवं अस्पताल जैसे बड़े सरकारी संस्थान में कैश शाखा की निगरानी, अकाउंटिंग, ऑडिट और बैंक मिलान की स्पष्ट व्यवस्था होना जरूरी है। ऐसे में कथित करोड़ों रुपये की विसंगति सामने आना अस्पताल की आंतरिक नियंत्रण व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े करता है।
अब अकाउंटेंट की भूमिका भी जांच के घेरे में
पुलिस जांच का एक अहम बिंदु अब अकाउंटेंट और संबंधित वित्तीय अधिकारियों की भूमिका भी हो सकता है। आखिर कैश शाखा में रकम प्राप्त होने के बाद रिकॉर्ड किसने जांचा? बैंक में जमा रकम का मिलान किसने किया? कैश बुक किसने सत्यापित की? और वरिष्ठ अधिकारियों को इसकी जानकारी किस स्तर पर दी जाती थी?
अगर जांच में किसी कर्मचारी या अधिकारी की भूमिका संदिग्ध पाई जाती है तो पुलिस उसके खिलाफ भी नियमानुसार कार्रवाई कर सकती है।
किसके इशारे पर हुआ कथित खेल?
इस पूरे मामले का सबसे बड़ा सवाल यही है—क्या कथित वित्तीय गड़बड़ी केवल कर्मचारियों की लापरवाही थी या इसके पीछे किसी स्तर पर मिलीभगत भी थी?
कौन-कौन से रिकॉर्ड किसके पास रहते थे?
किसके हस्ताक्षर से रकम का हिसाब आगे बढ़ता था?
बैंक जमा की पुष्टि कौन करता था?
और यदि वर्षों तक कथित अंतर बना रहा तो वरिष्ठ अधिकारियों को इसकी जानकारी क्यों नहीं हुई?
इन सवालों के जवाब जांच की दिशा तय करेंगे।
क्या सामने आएंगे और सरकारी कर्मचारियों के नाम?
फिलहाल जांच का केंद्र नामजद आरोपी हैं, लेकिन पुलिस दस्तावेजों और बैंक रिकॉर्ड की पड़ताल कर रही है। यदि जांच के दौरान किसी अन्य सरकारी कर्मचारी, अधिकारी या जिम्मेदार व्यक्ति की भूमिका सामने आती है तो उसका नाम भी जांच में शामिल हो सकता है।
हालांकि जांच पूरी होने से पहले किसी अधिकारी या कर्मचारी को कथित भ्रष्टाचार में शामिल बताना उचित नहीं होगा। जिम्मेदारी साक्ष्यों के आधार पर ही तय होगी।
अब असली परीक्षा पुलिस जांच की,
गढ़ा थाना पुलिस के सामने अब सिर्फ आरोपियों की गिरफ्तारी नहीं, बल्कि कथित वित्तीय गड़बड़ी की पूरी कड़ी सामने लाने की चुनौती है। चौथे आरोपी की गिरफ्तारी और फरार महिला आरोपी की तलाश के बीच पुलिस को बैंक रिकॉर्ड, MRB, कैश बुक और अन्य दस्तावेजों से यह पता लगाना होगा कि कथित ₹1.63 करोड़ का अंतर आखिर कैसे पैदा हुआ।
महाकौशल के सबसे बड़े सरकारी अस्पताल में सामने आया यह मामला अब एक बड़ा सवाल बन चुका है—अगर 2020 से 2025 तक कथित तौर पर इतना बड़ा वित्तीय अंतर बना रहा, तो जिम्मेदारी सिर्फ कर्मचारियों की है या उस पूरी व्यवस्था की भी, जिसने समय रहते कथित गड़बड़ी को पकड़ने में नाकामी दिखाई?
अब सबकी नजर गढ़ा थाना पुलिस की जांच पर है। आने वाले दिनों में जांच की परतें खुलेंगी तो पता चलेगा कि मामला केवल नामजद आरोपियों तक सीमित रहता है या अन्य सरकारी कर्मचारियों और अधिकारियों की भूमिका भी सामने आती है।



