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जबलपुर मेडिकल कॉलेज: स्वास्थ्य के मंदिर में ‘ठेका शाही’ और ‘सिफारिशी’ तंत्र का आतंक!

मेडिकल कॉलेज: स्वास्थ्य के मंदिर में 'ठेका शाही' और 'सिफारिशी' तंत्र का आतंक!

जबलपुर का नेताजी सुभाष चंद्र बोस मेडिकल कॉलेज अस्पताल, जिसे महाकौशल की लाइफलाइन कहा जाता है, आज खुद बीमार नजर आ रहा है। यहाँ बीमारी इलाज की कमी नहीं, बल्कि उस ‘सिस्टम’ की है जिसने मरीजों की सेवा को धंधा और अस्पताल को राजनीति का अखाड़ा बना दिया है। यहाँ मरीजों के पर्चे से ज्यादा नेताओं की सिफारिशी चिट्ठियां चलती हैं और ठेका कंपनी के कर्मचारियों की दबंगई के आगे प्रशासन नतमस्तक है।

जबलपुर मेडिकल अस्पताल से आ रही तस्वीरें अब सिर्फ अव्यवस्था की कहानी नहीं कह रहीं, बल्कि एक संगठित भ्रष्टाचार और राजनीतिक दखलअंदाजी की ओर इशारा कर रही हैं। अस्पताल के भीतर काम कर रही प्राइवेट ठेका कंपनी की कार्यप्रणाली अब पूरी तरह से सवालों के घेरे में है। आरोप है कि इस कंपनी के माध्यम से होने वाली भर्तियों में योग्यता को ताक पर रखकर स्थानीय नेताओं की पसंद के लोगों को रखा जा रहा है।

नेताओं की ‘पर्ची’ और मनचाही ड्यूटी:
अस्पताल के गलियारों में चर्चा है कि यहाँ नौकरी पाने के लिए अनुभव से ज्यादा ‘रसूख’ की जरूरत होती है। नेताओं की सिफारिश पर भर्ती हुए ये कर्मचारी खुद को अस्पताल के नियमों से ऊपर समझते हैं। सूत्र बताते हैं कि ये ‘खास’ कर्मचारी अपनी मर्जी से शिफ्ट तय करते हैं और अपने हिसाब से विभाग चुनते हैं। जहाँ आम कर्मचारियों को कड़ी ड्यूटी करनी पड़ती है, वहीं ये रसूखदार कर्मचारी वार्डों से नदारद रहते हैं या सिर्फ नाम के लिए अपनी उपस्थिति दर्ज कराते हैं। इस भेदभाव ने अस्पताल के आंतरिक अनुशासन को पूरी तरह से ध्वस्त कर दिया है।

मरीजों की मजबूरी और वसूली का खेल:
सबसे भयावह पक्ष उन मरीजों का है जो दूर-दराज के गांवों से उम्मीद लेकर यहाँ आते हैं। ठेका कंपनी के कुछ कर्मियों पर आरोप है कि वे वार्ड बॉय से लेकर गार्ड तक की भूमिका में मरीजों से वसूली करते हैं। चाहे स्ट्रेचर लेना हो, बेड दिलाना हो या रिपोर्ट जल्दी मंगवानी हो—हर कदम पर पैसों की मांग की जाती है। विरोध करने पर मरीजों और उनके परिजनों के साथ अभद्र व्यवहार और दबंगई की जाती है। अस्पताल का सुरक्षा घेरा, जो मरीजों की सुरक्षा के लिए है, वह अब कथित तौर पर वसूली का जरिया बन चुका है।

सिस्टम की चुप्पी और जवाबदेही:
सवाल यह उठता है कि क्या अस्पताल प्रबंधन इन सबसे अनजान है? आरोप लग रहे हैं कि जिम्मेदार अधिकारियों को सब पता होने के बावजूद वे मौन हैं। क्या यह चुप्पी किसी बड़े दबाव का हिस्सा है? जब भर्ती प्रक्रिया से लेकर दैनिक कार्यों तक में राजनीतिक हस्तक्षेप होगा, तो निष्पक्ष कार्रवाई की उम्मीद किससे की जाए?

(निष्कर्ष)
एक सरकारी अस्पताल का उद्देश्य सबसे गरीब व्यक्ति को मुफ्त और सम्मानजनक इलाज देना होता है। लेकिन जबलपुर मेडिकल कॉलेज की यह ‘सिफारिशी संस्कृति’ और ‘वसूली तंत्र’ जनता के भरोसे का कत्ल कर रही है। अब जरूरत है कि इस पूरे मामले की उच्च स्तरीय और निष्पक्ष जांच हो। ठेका कंपनी के रिकॉर्ड खंगाले जाएं, भर्ती प्रक्रिया की ऑडिट हो और उन चेहरों को बेनकाब किया जाए जो सफेदपोशों के दम पर अस्पताल को अपनी जागीर समझ बैठे हैं।

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