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मध्यप्रदेश में फिर शुरू होगी “कार्यवाहक प्रभार” व्यवस्था, हाईकोर्ट के निर्देश के बाद पुलिस मुख्यालय का आदेश,जबलपुर हाईकोर्ट के आदेश के अनुपालन में जारी निर्देश, 2025 में लगाई गई रोक हटी; “कार्यवाहक” व्यवस्था पर फिर उठे सवाल
मध्यप्रदेश में फिर शुरू होगी “कार्यवाहक प्रभार” व्यवस्था, हाईकोर्ट के निर्देश के बाद पुलिस मुख्यालय का आदेश,जबलपुर हाईकोर्ट के आदेश के अनुपालन में जारी निर्देश, 2025 में लगाई गई रोक हटी; “कार्यवाहक” व्यवस्था पर फिर उठे सवाल

SET NEWS, भोपाल। पुलिस मुख्यालय मध्यप्रदेश द्वारा जारी एक महत्वपूर्ण प्रेस नोट में “कार्यवाहक प्रभार” देने की प्रक्रिया को पुनः प्रारंभ करने के निर्देश दिए गए हैं। यह निर्णय मध्यप्रदेश पुलिस मुख्यालय द्वारा जबलपुर स्थित उच्च न्यायालय के आदेश के अनुपालन में लिया गया है।
जारी आदेश (क्रमांक 630/2026, दिनांक 06 मई 2026) के अनुसार, म.प्र. पुलिस रेग्युलेशन पैरा-72 के तहत उच्च पदों पर “कार्यवाहक प्रभार” देने की प्रक्रिया, जो पूर्व में स्थगित कर दी गई थी, अब पुनः लागू की जाएगी।
क्या था पूरा मामला-
प्रेस नोट में बताया गया है कि सामान्य प्रशासन विभाग द्वारा 19 जून 2025 को नियमित पदोन्नति के संबंध में अधिसूचना जारी होने के बाद पुलिस मुख्यालय ने 20 जून 2025 को एक आदेश जारी कर “कार्यवाहक प्रभार” देने की प्रक्रिया को अस्थायी रूप से रोक दिया था।
इस रोक का उद्देश्य नियमित- पदोन्नतियों को प्राथमिकता देना और अस्थायी व्यवस्थाओं को सीमित करना था। हालांकि बाद में इस निर्णय को चुनौती देते हुए उच्च न्यायालय में याचिका दायर की गई।

हाईकोर्ट का हस्तक्षेप-
मध्यप्रदेश उच्च न्यायालय ने 23 अप्रैल 2026 को पारित आदेश में स्पष्ट निर्देश दिए कि उच्च पदों पर “कार्यवाहक प्रभार” देने की प्रक्रिया को जारी रखा जाए। इसी के अनुपालन में अब पुलिस मुख्यालय ने सभी इकाइयों को यह प्रक्रिया पुनः प्रारंभ करने के निर्देश जारी कर दिए हैं।
क्या है “कार्यवाहक प्रभार”-
“कार्यवाहक प्रभार” वह व्यवस्था है जिसमें किसी अधिकारी को स्थायी पदोन्नति के बिना ही उच्च पद की जिम्मेदारी अस्थायी रूप से सौंप दी जाती है। यह व्यवस्था आमतौर पर प्रशासनिक रिक्तियों को भरने और कार्य की निरंतरता बनाए रखने के लिए अपनाई जाती है।
व्यवस्था की खामियां भी आईं सामने-
हालांकि इस व्यवस्था को प्रशासनिक आवश्यकता बताया जाता है, लेकिन “कार्यवाहक” प्रणाली लंबे समय से विवादों में रही है। प्रमुख खामियां इस प्रकार हैं
स्थायित्व का अभाव:
कार्यवाहक अधिकारी के पास पूर्ण अधिकार नहीं होते, जिससे निर्णय लेने में हिचकिचाहट रहती है।
पदोन्नति में देरी:
यह व्यवस्था कई बार नियमित पदोन्नतियों को टालने का माध्यम बन जाती है।
प्रभाव और दबाव:
अस्थायी पद होने के कारण अधिकारी पर बाहरी या वरिष्ठ दबाव अधिक रहता है।
जवाबदेही का संकट:
स्पष्ट जिम्मेदारी तय नहीं हो पाती, जिससे प्रशासनिक पारदर्शिता प्रभावित होती है।
वरिष्ठता विवाद:
कई मामलों में यह व्यवस्था वरिष्ठता और पात्रता को दरकिनार कर दी जाती है, जिससे असंतोष बढ़ता है।
आगे क्या असर पड़ेगा-
विशेषज्ञों का मानना है कि हाईकोर्ट के निर्देश के बाद यह व्यवस्था प्रशासनिक कामकाज को गति जरूर देगी, लेकिन यदि नियमित पदोन्नतियां समय पर नहीं की गईं तो “कार्यवाहक” प्रणाली फिर से असंतोष और विवाद का कारण बन सकती है।
पुलिस मुख्यालय ने स्पष्ट किया है कि यह निर्णय पुलिस महानिदेशक की स्वीकृति से लागू किया गया है और सभी इकाइयों को निर्देशित किया गया है कि आदेश का तत्काल पालन सुनिश्चित करें।



