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मेडिकल में मरीजों की दलाली का कथित खेल! सरकारी इलाज से निजी अस्पताल तक कौन पहुंचा रहा मरीज?

जबलपुर। महाकौशल के सबसे बड़े सरकारी अस्पताल नेताजी सुभाष चंद्र बोस मेडिकल अस्पताल में इलाज की उम्मीद लेकर पहुंचने वाले मरीजों को लेकर अब गंभीर सवाल खड़े हो रहे हैं। आरोप है कि दूसरे जिलों से रेफर होकर मेडिकल पहुंचने वाले कुछ मरीजों को सरकारी इलाज मिलने के बजाय निजी अस्पतालों तक पहुंचाया जा रहा है। सवाल सीधा है—सरकारी अस्पताल में इलाज के लिए आया मरीज आखिर निजी अस्पताल तक कैसे पहुंच जाता है?

रेफर मरीजों पर किसकी नजर?
आरोप है कि मेडिकल अस्पताल में आने वाले मरीजों और उनके परिजनों से कुछ लोग संपर्क करते हैं और उन्हें बेहतर इलाज, आयुष्मान कार्ड या दुर्घटना के मुफ्त इलाज का हवाला देकर निजी अस्पताल जाने के लिए तैयार किया जाता है। अगर यह आरोप सही है तो यह सिर्फ मरीजों के साथ धोखा नहीं, बल्कि सरकारी स्वास्थ्य व्यवस्था की निगरानी पर भी बड़ा सवाल है।

मरीज की मजबूरी, दलालों का फायदा?
अस्पताल में पहुंचने वाला मरीज पहले से बीमारी, दुर्घटना और आर्थिक परेशानी से जूझ रहा होता है। ऐसे समय में अगर कोई व्यक्ति उसे भ्रमित कर निजी अस्पताल तक पहुंचाता है और बाद में इलाज के नाम पर मोटी रकम वसूली जाती है, तो मामले की निष्पक्ष जांच बेहद जरूरी हो जाती है। हालांकि प्रत्येक शिकायत की सत्यता दस्तावेज और मरीजों के बयान से ही तय होगी।

डॉक्टर से लेकर एंबुलेंस तक जांच जरूरी,
इन आरोपों में कुछ डॉक्टरों, वार्ड बॉय, सिक्योरिटी गार्ड, निजी एंबुलेंस संचालकों और बाहरी एंबुलेंस से जुड़े कर्मचारियों की भूमिका की जांच की मांग उठ रही है। सवाल यह है कि क्या किसी मरीज को निजी अस्पताल ले जाने से पहले अस्पताल की अनुमति ली गई? रेफरल किस डॉक्टर ने किया? एंबुलेंस किसने बुलाई और मरीज को किस अस्पताल में ले जाया गया? इन सवालों के जवाब सीसीटीवी, रेफरल रिकॉर्ड और एंबुलेंस लॉगबुक से मिल सकते हैं।

अधीक्षक और डीन की जिम्मेदारी पर बड़ा सवाल,
मेडिकल अस्पताल अधीक्षक अरविंद शर्मा और डीन नवनीत सक्सेना के सामने भी अब जवाबदेही का सवाल है। यदि अस्पताल में मरीजों को निजी अस्पतालों तक पहुंचाने की शिकायतें सामने आ रही हैं तो प्रशासन ने इसकी निगरानी के लिए क्या व्यवस्था की है? अस्पताल परिसर में मरीजों से संपर्क करने वाले बाहरी लोगों पर नजर क्यों नहीं? अगर जांच में आरोप सही पाए जाते हैं तो जिम्मेदार लोगों पर कार्रवाई कब होगी?

आयुष्मान के नाम पर खेल तो नहीं?
सबसे बड़ा सवाल आयुष्मान कार्ड को लेकर भी है। क्या मरीजों को वास्तव में आयुष्मान योजना के तहत इलाज उपलब्ध नहीं था, या उन्हें किसी अन्य वजह से निजी अस्पताल भेजा गया? यदि निजी अस्पताल में आयुष्मान योजना के तहत इलाज हुआ तो उसका पूरा रिकॉर्ड क्या है? और यदि मरीज से अतिरिक्त रकम ली गई तो उसकी जांच कौन करेगा?

सरकारी अस्पताल की व्यवस्था पर सवाल,
मेडिकल अस्पताल में आने वाला हर मरीज सरकारी व्यवस्था पर भरोसा करता है। ऐसे में यदि किसी स्तर पर मरीजों को निजी अस्पतालों की ओर मोड़ने की शिकायत सही साबित होती है तो यह गंभीर प्रशासनिक मामला होगा। वहीं यदि आरोप निराधार हैं तो अस्पताल प्रशासन को भी रिकॉर्ड सामने रखकर स्थिति स्पष्ट करनी चाहिए, ताकि मरीजों और उनके परिजनों के बीच भ्रम खत्म हो।

अब आश्वासन नहीं, जांच और कार्रवाई चाहिए,
मामले में जरूरत है कि मेडिकल अस्पताल प्रशासन निष्पक्ष जांच कराए। रेफरल रिकॉर्ड, सीसीटीवी फुटेज, एंबुलेंस की जानकारी, आयुष्मान रिकॉर्ड, निजी अस्पतालों के बिल और मरीजों के बयान की जांच हो। अगर कोई दोषी मिलता है तो उसके खिलाफ सख्त कार्रवाई हो और अगर आरोप गलत पाए जाते हैं तो इसकी भी सार्वजनिक जानकारी दी जाए।

सबसे बड़ा सवाल—मरीज किसके भरोसे?
मुद्दा सिर्फ मेडिकल अस्पताल का नहीं, उन हजारों मरीजों का है जो इलाज की उम्मीद में यहां पहुंचते हैं। इसलिए सवाल उठना स्वाभाविक है—क्या सरकारी अस्पताल में मरीज का इलाज प्राथमिकता है या उसे निजी अस्पताल तक पहुंचाने का कोई कथित नेटवर्क सक्रिय है? इन आरोपों का सच जांच से सामने आना चाहिए। मरीजों के भरोसे के साथ किसी भी स्तर पर समझौता नहीं होना चाहिए।

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