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साइबर ठगी पर हाईकोर्ट की बड़ी चेतावनी… धीमी जांच अब नहीं होगी बर्दाश्त,असम, झारखंड और पश्चिम बंगाल के डीजीपी 21 जुलाई को कोर्ट में होंगे पेश, केंद्र, आरबीआई और दूरसंचार विभाग से भी मांगा जवाब
साइबर ठगी पर हाईकोर्ट की बड़ी चेतावनी... धीमी जांच अब नहीं होगी बर्दाश्त,असम, झारखंड और पश्चिम बंगाल के डीजीपी 21 जुलाई को कोर्ट में होंगे पेश, केंद्र, आरबीआई और दूरसंचार विभाग से भी मांगा जवाब

SET NEWS, सुनील सेन जबलपुर। साइबर अपराधों की बढ़ती चुनौती और उनकी जांच में हो रही सुस्ती पर मध्यप्रदेश हाईकोर्ट ने कड़ा रुख अपनाया है। अदालत ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि डिजिटल अपराधों के दौर में पारंपरिक और धीमी जांच प्रणाली से अपराधियों तक पहुंचना संभव नहीं है। यदि जांच एजेंसियां साइबर अपराधियों से तेज नहीं चलेंगी तो पीड़ितों को समय पर न्याय नहीं मिल पाएगा। इसी गंभीरता को देखते हुए हाईकोर्ट ने असम, झारखंड और पश्चिम बंगाल के पुलिस महानिदेशकों (डीजीपी) को 21 जुलाई को व्यक्तिगत रूप से उपस्थित होकर जांच की अद्यतन स्थिति बताने के निर्देश दिए हैं।
साइबर अपराध राज्य की सीमाओं में नहीं बंधे-
न्यायमूर्ति हिमान्शु जोशी की एकलपीठ ने सुनवाई के दौरान कहा कि साइबर अपराध राज्य की सीमाओं में बंधे नहीं हैं। ऐसे में अलग-अलग राज्यों की पुलिस, बैंकिंग संस्थानों और दूरसंचार एजेंसियों के बीच तेज समन्वय और तत्काल सूचना आदान-प्रदान की व्यवस्था अनिवार्य है।
केंद्र, बैंकिंग और टेलीकॉम तंत्र से भी मांगा जवाब-
मामले की सुनवाई के दौरान अदालत ने केंद्रीय गृह मंत्रालय, भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआई) और दूरसंचार विभाग को भी पक्षकार बनाते हुए जवाब पेश करने के निर्देश दिए। हाईकोर्ट ने संकेत दिए कि साइबर ठगी की रोकथाम केवल पुलिस की जिम्मेदारी नहीं है, बल्कि बैंक, मोबाइल सेवा प्रदाता, सोशल मीडिया और डिजिटल प्लेटफॉर्म की जवाबदेही भी तय करनी होगी।
6.25 लाख की ठगी के बाद हाईकोर्ट पहुंचीं पीड़िता-
पूरा मामला जबलपुर निवासी 70 वर्षीय चैताली मित्रा से जुड़ा है। उनके बैंक खाते से 26 अप्रैल 2025 को करीब 6.25 लाख रुपये ऑनलाइन ठगी के जरिए निकाल लिए गए थे। गोराबाजार थाने में शिकायत दर्ज कराने के बावजूद कार्रवाई अपेक्षित गति से आगे नहीं बढ़ी। इसके बाद उन्होंने राहत के लिए हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया।
जांच में आ रही तकनीकी और अंतरराज्यीय बाधाएं-पुलिस कप्तान
सुनवाई के दौरान जबलपुर पुलिस कप्तान संपत उपाध्याय, गोराबाजार टीआई भूपेंद्र आर्मो तथा विवेचना अधिकारी संजीव कुमार त्रिपाठी न्यायालय में उपस्थित हुए। कप्तान उपाध्याय ने अदालत को बताया कि बैंकों से आवश्यक तकनीकी जानकारी मिलने में तीन से पांच दिन लग जाते हैं। वहीं टेलीग्राम जैसे एन्क्रिप्टेड प्लेटफॉर्म से आईपी लॉग और अन्य डिजिटल साक्ष्य प्राप्त करना आसान नहीं होता। इसके अलावा दूसरे राज्यों की पुलिस से समय पर सहयोग नहीं मिलने से जांच की रफ्तार प्रभावित होती है। उन्होंने यह भी बताया कि इस मामले में संदिग्ध की लोकेशन असम में ट्रेस हुई है।
हर पल की देरी अपराधियों के लिए मौका-
हाईकोर्ट ने टिप्पणी करते हुए कहा कि साइबर अपराधों में हर मिनट और हर सेकंड बेहद महत्वपूर्ण होता है। यदि सूचनाओं का आदान-प्रदान फाइलों और औपचारिक पत्राचार तक सीमित रहेगा तो अपराधी आसानी से साक्ष्य मिटाकर जांच एजेंसियों की पकड़ से बाहर निकल जाएंगे। अदालत ने स्पष्ट किया कि समय की मांग एक ऐसी रियल-टाइम समन्वित डिजिटल व्यवस्था है, जिसमें राज्यों की पुलिस, बैंक, टेलीकॉम कंपनियां और केंद्रीय एजेंसियां तत्काल जानकारी साझा कर सकें।
जांच की प्रगति पर होंगे सीधे जवाब-तलब-
मामले की अगली सुनवाई 21 जुलाई को होगी। जब अदालत तीन राज्यों के डीजीपी से जांच की प्रगति पर सीधे जवाब तलब करेगी। यह सुनवाई देश में साइबर अपराधों की जांच व्यवस्था को अधिक प्रभावी और जवाबदेह बनाने की दिशा में अहम मानी जा रही है।



