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Madhya Pradesh # “आस्था और परंपरा पर सवाल स्वीकार नहीं” पूर्व मुख्यमंत्री उमा भारती की दो टूक

प्रयागराज में शंकराचार्य की उपाधि पर सवाल, उमा भारती का प्रशासन पर तीखा प्रहार

सेटन्यूज़, डेस्क। भारतीय जनता पार्टी की वरिष्ठ नेत्री और मध्यप्रदेश की पूर्व मुख्यमंत्री उमा भारती ने प्रयागराज प्रवास के दौरान प्रशासन की ओर से शंकराचार्य से जुड़ी उपाधि को लेकर पूछे गए सवाल पर कड़ी प्रतिक्रिया व्यक्त की है। उन्होंने इसे धार्मिक परंपराओं में अनावश्यक हस्तक्षेप करार देते हुए प्रशासनिक रवैये पर गंभीर सवाल खड़े किए।

धार्मिक परंपराओं पर प्रशासनिक हस्तक्षेप का आरोप
उमा भारती ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि शंकराचार्य की उपाधि कोई सरकारी पद नहीं, बल्कि सनातन परंपरा की हजारों वर्षों पुरानी आध्यात्मिक व्यवस्था का हिस्सा है। ऐसे विषयों पर प्रशासन द्वारा सवाल उठाना न केवल अनुचित है, बल्कि यह धार्मिक स्वतंत्रता की भावना के भी विरुद्ध है।

“आस्था का सम्मान होना चाहिए”
पूर्व मुख्यमंत्री ने कहा कि भारत की आत्मा उसकी धार्मिक और सांस्कृतिक परंपराओं में बसती है। शंकराचार्य जैसी आध्यात्मिक संस्थाएं समाज को दिशा देने का कार्य करती रही हैं। प्रशासन को चाहिए कि वह आस्था के विषयों में संवेदनशीलता और संतुलन बनाए रखे, न कि ऐसे प्रश्न खड़े करे जो विवाद को जन्म दें।

संविधान का हवाला, धार्मिक स्वतंत्रता पर जोर
उमा भारती ने संविधान का उल्लेख करते हुए कहा कि देश का संविधान हर नागरिक को धर्म मानने, पालन करने और प्रचार करने की स्वतंत्रता देता है। ऐसे में किसी भी प्रशासनिक अधिकारी को यह अधिकार नहीं है कि वह धार्मिक उपाधियों या परंपराओं पर सवाल खड़ा करे।

सियासी हलकों में हलचल
इस बयान के बाद राजनीतिक और धार्मिक हलकों में चर्चा तेज हो गई है। कई संत-महात्माओं और सामाजिक संगठनों ने भी प्रशासनिक रवैये पर असहमति जताते हुए उमा भारती के बयान का समर्थन किया है।

प्रशासन से संयम की अपेक्षा
उमा भारती ने अंत में कहा कि प्रशासन का काम कानून-व्यवस्था बनाए रखना है, न कि धार्मिक मान्यताओं की व्याख्या करना। उन्होंने अपील की कि भविष्य में ऐसे संवेदनशील विषयों पर पूछताछ से पहले प्रशासन को गंभीरता से विचार करना चाहिए।

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