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जबलपुर: फर्जी रिपोर्ट, झूठा डॉक्टर और मरीजों से खिलवाड़! स्मार्ट सिटी अस्पताल का संचालक अमित खरे फर्जीवाड़े में माहिर,फायर सेफ्टी की बनाई थी फर्जी रिपोर्ट, इंजीनियर ने किया था खुलासा

जबलपुर। स्वास्थ्य सेवाओं के नाम पर फर्जीवाड़े का गढ़ बन चुका स्मार्ट सिटी अस्पताल और इसके संचालक स्वंयभू भाजपा नेता अमित खरे पर एक के बाद एक नए खुलासे सामने आ रहे हैं। अब यह भी उजागर हुआ है कि खरे का फर्जी खेल बेदीनगर स्थित एप्पल अस्पताल से ही शुरू हो गया था, जहां उसने फायर सेफ्टी की फर्जी रिपोर्ट तक तैयार करवा दी थी।

जाली हस्ताक्षर से तैयार फायर रिपोर्ट-
अग्निशमन इंजीनियर निखिल चनपुरिया ने 26 दिसंबर 2024 को सीएमएचओ को लिखित शिकायत भेजी थी। इसमें साफ आरोप लगाया गया था कि अस्पताल प्रबंधन ने फायर सेफ्टी सर्टिफिकेट की नकली रिपोर्ट तैयार कर उस पर उनके जाली हस्ताक्षर कर दिए। चनपुरिया ने कहा कि न तो उन्होंने कोई ऑडिट रिपोर्ट बनाई और न ही ऐसे दस्तावेजों पर हस्ताक्षर किए। शिकायत में यह भी खुलासा हुआ कि पूरी रिपोर्ट कंप्यूटर एडिटिंग से फर्जी तरीके से तैयार की गई थी। यह मामला साबित करता है कि खरे और उसका अस्पताल प्रशासन फर्जीवाड़े के लिए किसी भी हद तक जा सकता है।

मरीजों की जान से खिलवाड़-
खरे का खेल केवल कागजी हेराफेरी तक ही सीमित नहीं है। एक्सीडेंटल मरीजों को क्लेम के जरिए भर्ती कर तो लिया जाता है और डॉक्टर बुलाकर ऑपरेशन भी करवा दिया जाता है, लेकिन जब वही मरीज फॉलोअप के लिए लौटते हैं तो डॉक्टर उपलब्ध नहीं होते। कई मरीजों को समय पर इलाज न मिलने से पैर में संक्रमण तक हो गया, जिससे उनकी हड्डियां टूट गईं। स्वास्थ्य विभाग के पास शिकायतें पहुंचने के बावजूद अधिकारी चुप्पी साधे बैठे हैं।

डिग्री पर उठे सवाल,चर्चाएं सरगर्म-
सबसे बड़ा सवाल यह है कि आखिर अमित खरे डॉक्टर बना कैसे? चिकित्सक समुदाय में चर्चा है कि खरे के पास कोई मान्यता प्राप्त मेडिकल डिग्री ही नहीं है। पूर्व में अस्पताल से जुड़े और बाद में ठगे गए असल डॉक्टरों का कहना है कि अगर इस पहलू की गहराई से जांच की जाए तो एक बड़ा भांडाफोड़ सामने आएगा।

आखिर कार्रवाई से क्यों बच रहा प्रशासन-
फर्जी एमएलसी, बीमा कंपनियों से ठगी, गुंडागर्दी और अब फायर सेफ्टी रिपोर्ट से लेकर मरीजों की जिंदगी से खिलवाड़ अमित खरे के कारनामों की लंबी सूची है। सवाल उठता है कि स्वास्थ्य विभाग और जिला प्रशासन आखिर किस दबाव में आंखें मूंदकर बैठे हैं? क्या प्रशासन किसी बड़े हादसे का इंतजार कर रहा है या फिर यह पूरा खेल राजनीतिक संरक्षण की आड़ में फल-फूल रहा है?

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