तीन यातायात थाने, 9 TI, 3 DSP और 1 एडिशनल SP… फिर भी जबलपुर की सड़कों पर जाम! नो-एंट्री में बड़े वाहन कैसे?
186 पुलिसकर्मियों का अमला, लेकिन यातायात व्यवस्था पर सवाल—जनता पूछ रही, आखिर जवाबदेही किसकी?

जबलपुर। शहर की यातायात व्यवस्था सुधारने के लिए पुलिस विभाग ने अधिकारियों से लेकर जमीनी स्तर तक बड़ा ढांचा खड़ा कर रखा है। जबलपुर शहर में घमापुर, मालवीय चौक और गढ़ा—तीन यातायात थाने संचालित हैं। इन तीनों थानों में कुल 9 TI, तीन DSP और एक एडिशनल SP यातायात की निगरानी है। इसके अलावा तीनों थानों को मिलाकर करीब 186 पुलिसकर्मियों का स्टाफ बताया गया है। इसके बावजूद शहर के कई प्रमुख मार्गों पर जाम, अव्यवस्थित पार्किंग, ई-रिक्शा और ऑटो की मनमानी तथा नो-एंट्री के दौरान बड़े वाहनों की आवाजाही जैसे सवाल लगातार सामने आ रहे हैं।
तीन थाने—यातायात संभालने के लिए पूरा प्रशासनिक ढांचा,
जबलपुर जैसे तेजी से बढ़ते शहर में यातायात का दबाव लगातार बढ़ रहा है। सुबह स्कूल और कार्यालय के समय से लेकर शाम के व्यस्त समय तक प्रमुख चौराहों पर वाहनों की कतार दिखाई देती है। ऐसे में तीन अलग-अलग यातायात थानों के जरिए व्यवस्था को नियंत्रित करने की जिम्मेदारी तय की गई है।
घमापुर यातायात थाना, मालवीय चौक यातायात थाना और गढ़ा यातायात थाना अपने-अपने क्षेत्रों में यातायात नियंत्रण, नियमों का पालन, नो-एंट्री व्यवस्था, पार्किंग और सड़क सुरक्षा की जिम्मेदारी संभालते हैं।
मालवीय चौक थाना—75 का स्टाफ, फिर भी जाम का सवाल,
मालवीय चौक यातायात थाना में करीब 75 पुलिसकर्मियों का स्टाफ बताया गया है। यहां TI दिनेश शर्मा,TI रोहित तिवारी,Ti संजीव रावत, सहित तीन की जिम्मेदारी है। मालवीय चौक शहर के प्रमुख और व्यस्त क्षेत्रों में शामिल है, जहां दिनभर वाहनों का दबाव बना रहता है। इतने बड़े स्टाफ के बावजूद यदि व्यस्त समय में चौराहों पर वाहनों की रफ्तार थमती है और जाम लंबा होता जाता है, तो यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि क्या फील्ड मॉनिटरिंग को और मजबूत करने की जरूरत है?
घमापुर थाना—55 का अमला, फिर भी चुनौती बरकरार,
घमापुर यातायात थाना में करीब 55 पुलिसकर्मियों का स्टाफ बताया गया है। यहां TI अश्विनी पटेल,Ti योगेश चौकसे, वीरेंद्र आरक सहित तीन TI यातायात व्यवस्था संभाल रहे हैं। घमापुर और आसपास के क्षेत्रों में बाजार, सार्वजनिक परिवहन और स्थानीय यातायात के कारण दबाव बना रहता है। चौराहों पर ऑटो और ई-रिक्शा द्वारा अचानक वाहन रोकने से भी यातायात प्रभावित होने की शिकायतें सामने आती हैं।
गढ़ा थाना—56 पुलिसकर्मी, फिर भी सड़क पर क्यों दिखती अव्यवस्था?
गढ़ा यातायात थाना में करीब 56 पुलिसकर्मियों का स्टाफ बताया गया है। यहां TI मनीष प्यासी,Ti अमित सूर्यवंशी,Ti उमेश दुबे, सहित तीन TI की जिम्मेदारी है। गढ़ा, मेडिकल और आसपास के प्रमुख मार्गों पर यातायात का दबाव किसी से छिपा नहीं है।
अगर इतने बड़े अमले की मौजूदगी के बाद भी प्रमुख स्थानों पर यातायात बाधित होता है तो सवाल पुलिस बल की संख्या पर नहीं, बल्कि उसके सही स्थान पर और सही समय पर इस्तेमाल पर उठता है।
तीन DSP और एक एडिशनल SP—फिर भी निगरानी पर सवाल,
पूरी यातायात व्यवस्था की निगरानी के लिए एडिशनल SP यातायात अखिलेश तिवारी जिम्मेदारी संभाल रहे हैं। वहीं अलग-अलग यातायात क्षेत्रों में DSP संगीता डामोर, DSP संतोष शुक्ला और DSP बैजनाथ प्रजापति की जिम्मेदारी है।
अर्थात यातायात व्यवस्था में वरिष्ठ अधिकारियों से लेकर थाना स्तर तक जिम्मेदारी तय है। अब जरूरत इस बात की है कि अधिकारी लगातार फील्ड में जाकर यह देखें कि जिन स्थानों पर रोज जाम लगता है, वहां समस्या की वास्तविक वजह क्या है और उसका स्थायी समाधान कैसे किया जाए।
नो-एंट्री में बड़े वाहन आखिर पहुंचते कैसे हैं?
इस पूरी व्यवस्था के बीच सबसे बड़ा सवाल नो-एंट्री को लेकर है। जिन मार्गों पर निर्धारित समय में बड़े वाहनों का प्रवेश प्रतिबंधित है, वहां अगर भारी वाहन पहुंचते हैं तो सवाल उठता है कि निगरानी व्यवस्था कितनी प्रभावी है।
क्या नो-एंट्री प्वाइंट पर पुलिस की पर्याप्त मौजूदगी है? क्या CCTV से निगरानी की जा रही है? क्या नियम तोड़ने वाले प्रत्येक वाहन पर कार्रवाई होती है? क्या कार्रवाई के बाद भी वही वाहन दोबारा नियम तोड़ते हैं?
किसी पर आरोप नहीं, लेकिन व्यवस्था की जांच जरूरी,
यहां किसी अधिकारी या कर्मचारी पर बिना प्रमाण किसी प्रकार का आरोप लगाना उचित नहीं है। लेकिन यदि नो-एंट्री के दौरान बड़े वाहन लगातार प्रवेश करते दिखाई देते हैं तो संबंधित अधिकारियों को इसकी समीक्षा करनी चाहिए।
कौन से वाहन नियम तोड़ रहे हैं, किन स्थानों पर उल्लंघन अधिक है और कार्रवाई का आंकड़ा क्या है, इसकी नियमित समीक्षा से व्यवस्था को और मजबूत किया जा सकता है।
ई-रिक्शा और ऑटो की मनमानी भी बड़ी समस्या,
शहर के कई चौराहों पर ई-रिक्शा और ऑटो चालक सवारी बैठाने के लिए सड़क किनारे या लेफ्ट टर्न के पास वाहन रोक देते हैं। एक वाहन रुकता है, उसके पीछे दूसरा वाहन रुकता है और देखते ही देखते सड़क का एक हिस्सा बाधित हो जाता है।
यातायात पुलिस को ऐसे स्थानों को चिन्हित कर वहां नियमित निगरानी और कार्रवाई करनी होगी। केवल चालान कार्रवाई के बजाय जरूरत पड़ने पर नो-पार्किंग और निर्धारित स्टॉपिंग प्वाइंट की व्यवस्था भी प्रभावी तरीके से लागू करनी होगी।
186 पुलिसकर्मी—फिर जनता को राहत क्यों नहीं?
तीनों यातायात थानों में करीब 56, 75 और 55 पुलिसकर्मियों, यानी कुल करीब 186 पुलिसकर्मियों का अमला बताया गया है। इसके अलावा 9 TI, 3 DSP और 1 एडिशनल SP की व्यवस्था है।
यह संख्या अपने आप में बताती है कि यातायात सुधार के लिए पुलिस के पास पर्याप्त प्रशासनिक ढांचा मौजूद है। अब जनता की अपेक्षा केवल यही है कि इस व्यवस्था का असर सड़क पर भी दिखाई दे।
जनता को आंकड़े नहीं, जाम से राहत चाहिए,
आम नागरिक के लिए यह महत्वपूर्ण नहीं है कि किसी थाने में कितने अधिकारी तैनात हैं। उसके लिए महत्वपूर्ण यह है कि वह अपने घर से निकले तो समय पर गंतव्य तक पहुंचे।
स्कूल जाने वाले बच्चे, नौकरीपेशा लोग, व्यापारी, मरीजों को लेकर जाने वाले परिवार और रोजाना सफर करने वाले हजारों नागरिक चाहते हैं कि चौराहों पर यातायात सुचारु रहे और नियम सभी के लिए समान रूप से लागू हों।
अब जिम्मेदारी तय करने से ज्यादा समाधान जरूरी,
अगर किसी चौराहे पर रोज जाम लगता है तो उसे केवल रोजाना पुलिसकर्मी खड़े करके नहीं, बल्कि उसकी वजह खत्म करके सुधारा जाना चाहिए। यदि समस्या अवैध पार्किंग है तो पार्किंग व्यवस्था जरूरी है। यदि समस्या ई-रिक्शा और ऑटो की है तो उनके लिए निर्धारित स्थान जरूरी हैं। और यदि समस्या नो-एंट्री उल्लंघन है तो प्रवेश बिंदुओं पर प्रभावी निगरानी जरूरी है।
सड़क पर दिखना चाहिए पुलिस व्यवस्था का असर,
एडिशनल SP अखिलेश तिवारी, DSP संगीता डामोर, DSP संतोष शुक्ला, DSP बैजनाथ प्रजापति के साथ TI दिनेश शर्मा, TI अश्विनी पटेल और TI मनीष प्यासी सहित तीनों यातायात थानों के सभी TI के सामने सबसे बड़ी चुनौती यही है कि पुलिस व्यवस्था का असर जमीन पर दिखाई दे। तीन यातायात थाने, 9 TI, 3 DSP, 1 एडिशनल SP और करीब 186 पुलिसकर्मियों का अमला—इसके बाद भी अगर जनता जाम और नो-एंट्री उल्लंघन से परेशान है, तो अब सवाल संख्या का नहीं, सिस्टम की मॉनिटरिंग और फील्ड में उसके प्रभाव का है।
अंतिम सवाल—नो-एंट्री में बड़े वाहनों पर कब लगेगी पूरी लगाम?
जबलपुर की जनता अब केवल कार्रवाई की खबर नहीं, बल्कि स्थायी समाधान चाहती है। नो-एंट्री का पालन हो, बड़े वाहन नियमों के मुताबिक चलें, ई-रिक्शा और ऑटो निर्धारित स्थानों पर रुकें, लेफ्ट टर्न खुले रहें और प्रमुख चौराहों पर यातायात बिना रुकावट चलता रहे।
अब देखना होगा कि इतने बड़े पुलिस और प्रशासनिक ढांचे के बाद जबलपुर की सड़कों पर बदलाव कब दिखाई देता है और नो-एंट्री के बावजूद बड़े वाहनों की आवाजाही पर आखिर कब पूरी तरह लगाम लगती है।



