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जबलपुर में दो थानों की कार्रवाई, लेकिन सवाल एक — आखिर किसे बचा रही पुलिस? लाखों की शराब पकड़ाई, फिर भी असली माफिया गायब

दो थानों की कार्रवाई, लेकिन सवाल एक — आखिर किसे बचा रही पुलिस? लाखों की शराब पकड़ाई, फिर भी असली माफिया गायब

जबलपुर जिले में अवैध शराब कारोबार के खिलाफ पनागर और पाटन पुलिस ने संयुक्त रूप से बड़ी कार्रवाई करते हुए करीब 6 लाख 52 हजार रुपये की 6 हजार 850 पाव देशी शराब जब्त की है। कार्रवाई में एक लोडिंग पिकअप वाहन और एक अल्टो कार भी जब्त की गई। पुलिस ने कुछ आरोपियों को गिरफ्तार कर मामला दर्ज कर लिया, लेकिन इस पूरी कार्रवाई ने कई बड़े सवाल खड़े कर दिए हैं। आखिर इतनी बड़ी मात्रा में शराब किसकी थी? क्या पुलिस सिर्फ छोटे तस्करों को पकड़कर बड़े शराब कारोबारियों और ठेकेदारों को बचाने में लगी है?

पनागर थाना पुलिस को सूचना मिली थी कि कटनी की ओर से एक पिकअप वाहन में भारी मात्रा में अवैध शराब जबलपुर लाई जा रही है। पुलिस ने कुशनेर तिराहे पर घेराबंदी की, लेकिन वाहन चालक पुलिस को देखकर भाग निकला। पीछा करने के बाद वाहन को बघेली मोड़ के पास छोड़कर आरोपी फरार हो गए। जब पुलिस ने वाहन की तलाशी ली तो उसमें 128 कार्टून में भरी 6400 पाव देशी शराब बरामद हुई। शराब की कीमत करीब 6 लाख 7 हजार रुपये बताई गई। पुलिस ने वाहन जब्त कर मामला दर्ज कर लिया, लेकिन शराब का मालिक कौन है, यह अब तक सामने नहीं आया।

इधर पाटन थाना पुलिस ने भी मुखबिर की सूचना पर पाटन-मनकेड़ी रोड पर एक ग्रे रंग की अल्टो कार को रोकने की कोशिश की। कार चालक भागने लगा, लेकिन पुलिस ने पीछा कर वाहन को पकड़ लिया। कार से 450 पाव देशी शराब बरामद हुई। इस मामले में जितेंद्र जैन नाम के आरोपी को गिरफ्तार किया गया, जबकि उसके तीन साथी मौके से फरार हो गए। पुलिस ने चारों आरोपियों के खिलाफ आबकारी एक्ट के तहत मामला दर्ज किया है।

दोनों थानों की कार्रवाई देखने में बड़ी जरूर लग रही है, लेकिन सबसे बड़ा सवाल यही है कि आखिर इन शराब की खेपों के पीछे कौन है? क्या इतनी बड़ी मात्रा में शराब बिना किसी बड़े नेटवर्क, ठेकेदार या संरक्षण के सड़कों पर घूम सकती है? अगर शराब कटनी से जबलपुर लाई जा रही थी, तो क्या संबंधित शराब ठेकेदारों और गोदाम संचालकों से पूछताछ की गई? पुलिस ने अब तक इस पर कोई जवाब नहीं दिया।

स्थानीय लोगों का आरोप है कि जिले में अवैध शराब कारोबार लंबे समय से फल-फूल रहा है और इसमें बड़े शराब कारोबारी, सप्लायर और ठेकेदार शामिल हैं। लेकिन कार्रवाई हमेशा ड्राइवरों, छोटे सप्लायरों और गरीब युवकों तक सीमित रहती है। पुलिस हर बार वाहनों से शराब पकड़कर आंकड़े जरूर दिखाती है, मगर असली सरगनाओं तक पहुंचने की कोशिश शायद ही कभी दिखाई देती है।

अब सवाल यह भी उठ रहा है कि क्या यह कार्रवाई सिर्फ कागजी खानापूर्ति है? क्या पुलिस जानबूझकर शराब माफियाओं के नाम सामने नहीं आने दे रही? क्योंकि अगर निष्पक्ष जांच हो तो यह साफ हो सकता है कि आखिर जिले में अवैध शराब का इतना बड़ा नेटवर्क किसके संरक्षण में चल रहा है। जनता अब सिर्फ शराब जब्ती की खबर नहीं, बल्कि शराब माफियाओं के खिलाफ ठोस कार्रवाई देखना चाहती है।

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