एक देश, दो शिक्षा व्यवस्थाएं! कहीं 10वीं में पहली बोर्ड परीक्षा तो कहीं 5वीं में ही बोर्ड का दबाव, समान शिक्षा व्यवस्था पर उठे सवाल
सीबीएसई और राज्य बोर्डों की अलग-अलग परीक्षा प्रणालियों ने छेड़ी नई बहस, अभिभावक और शिक्षा विशेषज्ञ कर रहे एकरूपता की मांग

सेटन्यूज़, (सत्यजीत यादव)। देश में नई शिक्षा नीति के क्रियान्वयन के बीच स्कूली शिक्षा व्यवस्था को लेकर एक बार फिर बड़ा सवाल खड़ा हो गया है। एक ओर केंद्रीय माध्यमिक शिक्षा बोर्ड (सीबीएसई) से जुड़े अधिकांश छात्र पहली सार्वजनिक बोर्ड परीक्षा कक्षा 10 में देते हैं, वहीं दूसरी ओर कई राज्यों में राज्य शिक्षा बोर्डों के अंतर्गत पढ़ने वाले विद्यार्थियों को कक्षा 5 और कक्षा 8 में ही बोर्ड पैटर्न अथवा राज्यस्तरीय सार्वजनिक परीक्षाओं का सामना करना पड़ रहा है। इससे यह बहस तेज हो गई है कि जब देश एक है तो स्कूली परीक्षा प्रणाली अलग-अलग क्यों है।
राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 में कक्षा 3, 5 और 8 पर सीखने के स्तर का आकलन करने की व्यवस्था का उल्लेख किया गया है। साथ ही, वर्ष 2019 में बच्चों को निःशुल्क एवं अनिवार्य शिक्षा अधिकार अधिनियम (आरटीई) में संशोधन के बाद राज्यों को यह अधिकार दिया गया कि वे कक्षा 5 और 8 में परीक्षा आयोजित कर सकें तथा निर्धारित मानकों पर खरे नहीं उतरने वाले विद्यार्थियों के लिए पुनर्परीक्षा जैसी व्यवस्था लागू कर सकें। इसके बाद मध्य प्रदेश, हरियाणा, कर्नाटक, असम और कुछ अन्य राज्यों ने अलग-अलग स्वरूप में कक्षा 5 और 8 की सार्वजनिक परीक्षाएं शुरू कीं।
दूसरी ओर सीबीएसई की व्यवस्था अलग है। यहां कक्षा 5 और 8 के विद्यार्थियों के लिए विद्यालय आधारित मूल्यांकन, दक्षता आधारित परीक्षण और सीखने के स्तर की समीक्षा जैसी व्यवस्थाएं लागू हैं, जबकि सार्वजनिक बोर्ड परीक्षा का स्वरूप मुख्य रूप से कक्षा 10 और 12 में ही रहता है। हाल के वर्षों में सीबीएसई ने दक्षता आधारित मूल्यांकन, SAFAL आकलन और कक्षा 10 के लिए दो अवसर वाली बोर्ड परीक्षा जैसी सुधार प्रक्रियाएं भी शुरू की हैं।
शिक्षा विशेषज्ञों का कहना है कि अलग-अलग बोर्डों की परीक्षा प्रणाली, पाठ्यक्रम, मूल्यांकन पद्धति और कठिनाई स्तर में अंतर होने से विद्यार्थियों के बीच समान अवसर का प्रश्न उठता है। उनका मानना है कि यदि राष्ट्रीय स्तर पर प्रतियोगी परीक्षाओं और उच्च शिक्षा में समान अवसर उपलब्ध कराने हैं तो स्कूली मूल्यांकन प्रणाली में भी अधिक समन्वय और समानता की आवश्यकता होगी। इसी उद्देश्य से एनसीईआरटी के अंतर्गत गठित ‘परख (PARAKH)’ विभिन्न शिक्षा बोर्डों के मूल्यांकन में समानता लाने की दिशा में कार्य कर रहा है।
हालांकि राज्य सरकारों का तर्क है कि कक्षा 5 और 8 की परीक्षाओं का उद्देश्य बच्चों पर अतिरिक्त बोझ डालना नहीं, बल्कि शुरुआती कक्षाओं में सीखने की गुणवत्ता का आकलन करना और समय रहते कमजोरियों की पहचान करना है। वहीं कई अभिभावकों का मानना है कि कम उम्र में बोर्ड जैसी परीक्षा का दबाव बच्चों के मानसिक स्वास्थ्य और स्वाभाविक सीखने की प्रक्रिया को प्रभावित कर सकता है।
विशेषज्ञों का मानना है कि शिक्षा व्यवस्था में सुधार केवल परीक्षा प्रणाली बदलने से नहीं होगा। पूरे देश में पाठ्यक्रम, मूल्यांकन, शिक्षण गुणवत्ता और सीखने के मानकों में संतुलन स्थापित करना आवश्यक है ताकि किसी भी बोर्ड के छात्र को अवसरों और मूल्यांकन के स्तर पर असमानता का सामना न करना पड़े। आने वाले वर्षों में राष्ट्रीय शिक्षा नीति और ‘परख’ जैसी संस्थाओं की पहल इस दिशा में कितनी प्रभावी साबित होती है, इस पर देश की शिक्षा व्यवस्था का भविष्य काफी हद तक निर्भर करेगा।



