अघोषित बिजली कटौती और बार‑बार ट्रिपिंग: मध्यप्रदेश के आमजन की बढ़ती परेशानी, दावों के बावजूद नहीं मिला राहत
भीषण गर्मी में टूटती बिजली सप्लाई

सेटन्यूज़ (सत्यजीत यादव)। मध्यप्रदेश में इस वर्ष भीषण गर्मी के साथ‑साथ अघोषित बिजली कटौती और बार‑बार होने वाली ट्रिपिंग ने आम उपभोक्ताओं को परेशानी की अथाह सुनामी में धकेल दिया है। शहरी इलाकों के आम घरों से लेकर ग्रामीण क्षेत्रों तक बिजली की आपूर्ति अब अनिश्चित और अस्थिर हो चुकी है, जिसके चलते हर घर में एसी, कूलर और पंखों की धुन पर सवाल खड़े हो गए हैं। सरकार और ऊर्जा विभाग के दावों के बावजूद भी जमीन पर उपभोक्ता अब और “बिजली विश्वासियों” की लाइन में शामिल नहीं होना चाहते।
मध्यप्रदेश के कई जिलों में बिजली उपभोक्ता समितियों और उपभोक्ता हेल्पलाइनों पर अघोषित कटौती व ट्रिपिंग से जुड़ी शिकायतों की संख्या लगातार बढ़ती जा रही है। रीवा, मऊगंज, ग्वालियर, इंदौर जैसे कई छोटे‑बड़े शहरों में लोगों ने आधिकारिक स्तर पर शिकायतें दर्ज कराई हैं, लेकिन उनकी फरियादों पर अभी तक स्पष्ट जवाब या ठोस नीतिगत राहत नजर नहीं आ रही। कई इलाकों में उपभोक्ताओं ने बिजली विभाग के कार्यालयों पर धरना भी दिया, लेकिन अधिकारी सिर्फ मौसम, लोड या टेक्निकल गड़बड़ी की वजह बताकर मामले को टरका रहे हैं।
अघोषित कटौती: नियमों से दूर सरकारी व्यवस्था
ऊर्जा विभाग के अपने ही नियमों के अनुसार, एक बड़े शहर के घरेलू उपभोक्ता को वर्ष 2025‑26 तक अधिकतम 90 बार और 60 घंटे से अधिक अवैध कटौती का सामना नहीं करना चाहिए था, लेकिन जमीन पर कई इलाकों में यह लक्ष्य धरातल पर डूब चुका है। ग्रामीण क्षेत्रों में तो अधिकांश फीडरों पर आधिकारिक तौर पर दो‑चार घंटे की कटौती की बात कही जाती है, जबकि वास्तविकता में उपभोक्ताओं को 10 से 12 घंटे तक बिजली बाधित रहने का सामना करना पड़ रहा है, जो स्पष्ट रूप से अघोषित और नियमविरुद्ध कटौती की श्रेणी में आता है।
ट्रिपिंग की मार: खराब हो रहे घरेलू उपकरण
बिजली के लगातार ट्रिप होने की वजह से घरों में इनवर्टर, कूलर, पंखे और अन्य इलेक्ट्रॉनिक उपकरण खराब होने की घटनाएं बढ़ती जा रही हैं। छतरपुर, रीवा, ग्वालियर जैसे शहरों में फीडरों पर “लो वोल्टेज” और ओवरलोड की वजह से ट्रांसफार्मरों में बार‑बार खंडन होने से बिजली आधे‑अधूरी रहती है, जिससे शीतलन यंत्र भी सही तरह से काम नहीं कर पा रहे। उपभोक्ताओं का कहना है कि शिकायतें दर्ज कराने के बाद भी विभाग की तरफ से सिर्फ आधिकारिक जवाब आते हैं, लेकिन व्यावहारिक सुधार नहीं होता, जिससे लोगों का विश्वास और भी कमजोर होता जा रहा है।
नीतिगत दावे और जमीन पर हकीकत
ऊर्जा विभाग की ओर से प्रदेश को बिजली के मामले में आत्मनिर्भर बनाने के दावे लगातार किए जा रहे हैं, जिसमें यह भी कहा जाता है कि प्रदेश की कुल विद्युत क्षमता 25,000 मेगावॉट के आसपास है और हाल में ही 19,000 मेगावॉट से अधिक की मांग को भी बिना कटौती पूरा करने का दावा किया गया है। लेकिन जमीन पर यह थ्योरी और अभ्यास के बीच बड़ा अंतर दिखाई देता है, क्योंकि वितरण व्यवस्था, ट्रांसफार्मर की क्षमता और लोड मैनेजमेंट की कमियों के कारण छोटे‑छोटे शहरों और ग्रामीण क्षेत्रों में ट्रिपिंग व कटौती आम हो गई है।
जिम्मेदारी का कोई दागदार मोर्चा नहीं
सवाल यही उठता है कि जब इतनी बड़ी संख्या में अघोषित कटौती और ट्रिपिंग हो रही है, तो जिम्मेदारी सिर्फ मौसम, लोड और टेक्निकल गड़बड़ी पर डालते क्यों रहा जाता है? ऊर्जा विभाग, बिजली वितरण कंपनियों और नियामक आयोग के बीच जिम्मेदारी घेराघेरी में लिपटी हुई दिखती है, जिसके कारण उपभोक्ताओं को न तो स्पष्ट नीति मिल रही है और न ही किसी व्यक्ति या विभाग की तरफ से खुले रूप से जवाबदेही स्वीकार की जा रही है। राजनीतिक दलों ने भी इस मुद्दे को हाई वोल्टेज राजनीति में बदलने की कोशिश की है, लेकिन जमीन पर उपभोक्ता अब नारों से ज्यादा स्थायी और व्यावहारिक समाधान चाहते हैं।
आखिरी उम्मीद: निगरानी और पारदर्शिता
उपभोक्ता और विशेषज्ञों की मांग है कि बिजली ट्रिपिंग व अघोषित कटौती की वास्तविक आंकड़े और लोगों की शिकायतों को जनहित याचिका या राज्य विद्युत प्राधिकरण के माध्यम से निगरानी में लाया जाए, ताकि विभाग और नियामक आयोग को भी जवाबदेह ढंग से काम करना पड़े। साथ ही यह भी सुझाव हैं कि भविष्य में ट्रांसफार्मरों की क्षमता बढ़ाई जाए, फीडर री‑लोडिंग की व्यापक योजना बनाई जाए और हर बिजली निगम के अधिकारी को उन इलाकों के लिए जवाबदेही निर्धारित की जाए, जहां बार‑बार ट्रिपिंग दर अधिक हो, ताकि आम मध्यप्रदेशी को अंधेरे में नहीं और उम्मीद की रोशनी में रहने का मौका मिले।



